11:10 pm - Tuesday March 19, 2019

अवरुद्ध आर्थिक विकास : पारदर्शिता पर अति केन्द्रित , लोक लुभावन वशी , दिशाहीन सरकार, घोर असफलता की और अग्रसर क्यों हो रही है : सरकार समर्थकों की गहरी चिंता

अवरुद्ध आर्थिक विकास : पारदर्शिता पर अति केन्द्रित , लोक लुभावन वशी  , दिशाहीन सरकार, घोर  असफलता की और अग्रसर  क्यों हो रही है  : सरकार समर्थकों की गहरी चिंता                                                                   राजीव उपाध्यायRKU

अब १५ अगस्त पर जब मोदी जी लालकिले पर झंडा फह्रायेंगे तो देश का विद्वान् जानकारों का एक बदला मूड पाएंगे . अब पिछला वाला  उत्साह नहीं बचा . देश दुखी नहीं है पर पहले की तरह आशावान भी नहीं है . पुरानी  त्वरित विकास की आशाएं भी धुल धूसरित हो चुकी हैं .

अरुण जैटली के विकास के झूठे आंकड़ों पर किसी को विश्वास नहीं है . अगर विकास होता तो ही तो दीखता . सिर्फ कागजों मैं विकास हो रहा है .न उद्योग पनप रहे न बिजली का उत्पादन बढ़ रहा न ही सडकों या रेल का जाल बन रहा . न ही कोई गैर आर्थिक मामलों मैं जैसे शिक्षा व् स्वस्थ मैं कुछ विशेष प्रगति हो रही . सिर्फ एक के बाद एक अधपकी स्कीमें व् आश्वासन परोसे जा रहे हैं . हिन्दू वोट बैंक तो ठगा महसूस कर रहा है और बहुत नाराज़ है क्योंकि  न तो मंदिर बन रहा न ही शिक्षा मैं कुछ सुधार  हुआ है .तूश्तिकरण कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ा ही है .अरुण शौरी ने जो कहा था वह द्वेष वश नहीं बल्कि चेतावानी थी जो अब सच होती दीख रही है .

उधर सरकार के बेलगाम बाबुओं ने उद्योगपतियों को नए अवतार मैं प्रतडित करना शुरू कर दिया है जिसे टैक्स का आतंकवाद कहते हैं . पुराने मामलों को जीवित किया जा रहा है. मेगी मेल को इतना अनावश्यक तूल देना सरकार की बेवकूफी ही कहा जाएगा . इससे हम विदेशी निवेशकों को डरा ही रहे हैं . इसलिए कोई नया बड़ा विदेशी निवेश भारत मैं नहीं आ रहा . मात्र शेयर मार्किट मैं निवेश हो रहा है पर भारतीय कंपनियों का प्रदर्शन बहुत खराब है . बड़ी कंपनियों के मुनाफे मैं कमी हुयी है . कुछ दिनों मैं निवेशक अपना पैसा निकाल लेंगे .भारतीय उद्योगपति अभी भारत मैं अपनी पूंजी नहीं लगा रहे क्योंकि मांग नहीं बढ  रही है . जब बिकवाली नहीं होगी तो कौन पैसा लगाएगा . नयी नौकरियाँ तो अब दुस्स्वप्न ही दीखती हैं . इन सबकी जिम्मेवारी सरकारी बाबुओं व् अज्ञानी व् अहंकारी मंत्रियों की ही है. इन्फ्रा स्ट्रक्चर की कम्पनियां क़र्ज़ मैं डूबी हुयी हैं . बैंकों को हालत भी बिन चुके कर्जों से खराब है . बिल्डरों के लाखों  मकान बिना बिके पड़े हैं . इस ब्याज दर पर घर खरीदना मुश्किल है . सरकार की पुरानी  योजनायें जैसे जन धन , स्वच्छता अभियान  इत्यादि सफल होती नहीं दीख रहीं है . तेल की कीमत कम होने का कोई लाभ विकास के किये नहीं किया गया. रिजर्व बैंक विकास को अपनी जिम्मेवारी नहीं मानता . निति आयोग तो बिना दांत का सांप हो गया है जिसका कोई योग्दान नहीं बचा. सरकार इंदिरा गाँधी की तरह मंहगाई पर असली अंकुश लगाने के लिए व्यपारियों को खाद्यान खरीदने के के लिए बैंक लोन बंद करने का साहस नहीं रखती . इसलिए मंहगाई को उद्योगों को रोक कर कण्ट्रोल करना पद रहा है . वाजपेयी जी ने भी किसानों के मूल्यों को रोक कर मंहगाई कम की थी . इसका परिणाम जगत विदित है . उधर निर्यात की हालत भी बहुत खस्ता है . चीन से सस्तामाल बनायेंगे तभी तो निवेशक भारत आयेंगे . थाईलैंड मैं उद्योग लगाना ज्यादा सस्ता है . हमारी भूमि व् मजदूरी ज्यादा है . ठेके पर मजदूरी बिना चीन से हम नहीं जीत सकते . .

सरकार के कुछ जनता को विश्वास मैं  लेने के लिए उठाये गए पारदर्शिता के कदम भी आर्थिक व् औद्योगिक विकास मैं बाधक हो गए हैं . मंहगी कोयले की दरों से बिजली कंपनियां दूर हो गयी हैं . इस साल बिजली उत्पादन पिछले साल जैसा नहीं बढ़ा है . इसी तरह स्पेक्ट्रम की नीलामी से देश की जनता को कोई वास्तविक फायदा नहीं हुआ है .सिर्फ मंनरेगा जैसी फ़िज़ूल खर्ची को बढ़ावा मिला है. पुरानी  कोयला व् स्पेक्ट्रम निति से जनता को सस्ते दर पर सेवा मिलती थी .

‘ मेड इन इंडिया ‘ भी अब तक एक खोखला नारा ही है . नयी स्कीमों को सफल बनाने के लिए जिस गहन चिंतन , विश्वास  , एकाग्रता व् साहस की आवश्यकता होती है वह न ही नेताओं मैं न ही बाबुओं मैं है . नरसिम्हा राव की तरह बड़े परिवर्तन करने का राजनितिक साहस किसी मैं नहीं दीखता. सीबीआई व्  विजिलेंस के वर्चस्व मैं विकास संभव नहीं है .दर और सहस एक साथ नहीं रह सकते . पुरानी नीतियों से बड़े अफसरों को सीबीआई व् विजिलेंस से बचाना आवश्यक है. क्योंकि टाटा से भी नेनो मैं भूल हो गयी थी . जो काम करेगा उससे गलती भी होगी . गलती पर खा जाने से किस मैं हिम्मत होगी .देश भक्ति मैं सैनिक जान देते हैं बाबु जेल नहीं जायेंगे .

कोई नयी रक्षा संबंधी विदेशी कंपनी तभी भारत आयेगी जब उसे बड़े सौदे मिलेंगे . सौदे हम दे नहीं रहे . राफेल हवाई जहाज की डील समाप्त करने से हमारी विश्वसनीयता बढ़ी नहीं है . रूस हमसे वैसे ही रुष्ट है . टाटा ने बोफोर से बढ़िया तोप बनायी है पर उसे अब तक आर्डर नहीं दिया गया . वास्तवमें यदि भारत मैं रक्षा कंपनियों को बढ़ावा देना है तो चुन चुन  के बड़ी कोमप्नियों को आर्डर देने होंगे . इन्हें टेंडर से नहीं दिया जा सकता. पारदर्शिता के जूनून को विकास की  रफ़्तार रोकने नहीं दिया जा सकता .बिना टेंडर के आर्डर देना भी निति का अंग होना चाहिए .

कुल मिला कर सरकार की पिछले वर्ष मैं कोई विशेष उपलब्धि नहीं है . मंहगाई जरूर कम हुयी है परन्तु नेहरु / इंदिरा युग की बदनाम  चार प्रतिशत विकास दर भी वापिस आ गयी है ( सात के छल मैं न आयें ) . मोदी जी अभी भी लंका जाने के लिए साहस जुटाने को जामवंत की खोज मैं हैं . उन्हें तो लंका की अभी राह बताने वाला जटायु भी नहीं मिला .अरुण जेटली की उपयोगिता अब एक सवाल बन गयी  है जिसका शीघ्र ही समाधान ढूंढना होगा . समय सूखी रेत  सा हाथ से निकल रहा है , नीचे जमीन खिसक रही है उसे रोकना आवश्यक है . यह चिंता सरकारी  विफलता से खुश विपक्ष की नहीं बल्कि सरकार के प्रबल समर्थकों की है क्योंकि कांग्रेस के कुशासन की वापसी कोई नहीं चाहता . परन्तु व्यापम की अनगिनित मौतों ने उसको पुनर्जीवित कर दिया है .

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