10:21 am - Sunday October 22, 2017

आधुनिक भारत के आर्थिक विनाश का इतिहास – अंग्रेजों की लगान प्रणालियाँ , पूँजीपलायन व् अकाल

आधुनिक भारत के  आर्थिक विनाश का इतिहास – अंग्रेजों की  लगान  प्रणालियाँ

पूँजी बहिर्गमन व् अकाल  ( भारत कोष )

इससे पहले की हम बीमा मैं विदेशी पूँजी निवेश की सीमाएं बढाएं हमें अपने मीडिया के पूंजीपतियों व् विदेशियों के हाथ सौंप देने से उसके  दुरूपयोग को भी देखना चाहिए . पिछले कई वर्षों से भारत से पूँजी पलायन हो रहा है क्योंकि हमारे उद्योगपतियों को भारत की सरकार से विश्वास हट गया है. इसी प्रकार वालमार्ट सरीखी खुदरा व्यापार की कंपनियां  किसानों  को अपने चुंगुल मैं ले सकती  हैं और ज़मींदारी व्यवस्था पीछे से फिर आ सकती है. इसी प्रकार साम्यवाद तो ठीक ही ख़त्म हुआ परन्तु गरीबी के  शोषण की सीमा का निर्धारण भी आवश्यक है .मीडिया पर विदेशियों और पूँजी पतियों के कब्ज़े से देश को सच कभी पता नहीं चलेगा. इसलिए देश को सतर्क रहने की आवश्यकता है . प्रबुद्ध पाठक इस लेख को पढ़ आज के सन्दर्भ मैं सोचें

राजीव उपाध्याय

RKUhttp://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%86%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8

अंग्रेज़ों ने भारतीय कृषि के क्षेत्र में ‘भूमि व्यवस्था’ व ‘भू-राजस्व’ के अन्तर्गत व्यापक परिवर्तन किया था। उन्होंने अनेक भू-धृति पद्धतियाँ लागू कीं, जिनमें मुख्य थीं- स्थायी बन्दोबस्त या ज़मींदारी प्रथा, ‘महालवाड़ी व्यवस्था‘ एवं ‘रैय्यतवाड़ी व्यवस्था‘। लगान व्यवस्था के अंतर्गत 1790 ई. में लॉर्ड कॉर्नवॉलिस ने दसवर्षीय व्यवस्था को लागू किया था। यह व्यवस्था 1793 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में स्थाई रूप से लागू कर दी गई। ब्रिटिश भारत की 19 प्रतिशत भूमि पर यह व्यवस्था निश्चित कर दी गई थी। इसके बाद ‘महालवाड़ी व्यवस्था’ का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1819 ई. में ‘हॉल्ट मैकेंजी’ द्वारा लाया गया। सबसे पहले यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं पंजाब में लागू की गई थी। इसके अंतर्गत भूमि का लगभग 30 प्रतिशत भाग शामिल था। 1792 ई. में ‘रैय्यतवाड़ी व्यवस्था’ मद्रास के बारामहल में पहली बार लागू की गई। मद्रास में यह व्यवस्था 30 वर्षों तक लागू रही। 1835 ई. में भू-सर्वेक्षण के आधार पर इसे बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में भी लागू कर दिया गया था।

भूमि व्यवस्था

Blockquote-open.gifदादाभाई नौरोजी ने भारत की वास्तविक गरीबी का कारण ‘भारतीय धन की निकासी’ को ही माना। उन्होंने ब्रिटिश शासन से पूर्व की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि, मुग़लों एवं तुर्कों ने भारत को अवश्य ही लूटा, परन्तु उस धन का उपयोग देश के भीतर ही किया। भले ही वह धन सुल्तानों और बादशाहों के व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं पर ख़र्च किया गया था, परन्तु अंग्रेज़ों ने भारतीय धन को इतनी दूर ले जाकर ख़र्च किया कि, उसका कोई भी लाभ हमें नहीं मिल सका। अंग्रेज़ों ने हमारा धन कभी भी हमारे भले के लिये ख़र्च नहीं किया। Blockquote-close.gif

भारत में अंग्रेज़ों ने जो भूमि व्यवस्था लागू की थी, उनका विवरण इस प्रकार से है-

स्थायी बन्दोबस्त

इस व्यवस्था को ‘ज़मींदारी प्रथा’, ‘मालगुज़ारी‘ व ‘बीसवेदारी’ नाम से भी जाना जाता था। इस व्यवस्था के लागू किये जाने से पूर्व ब्रिटिश सरकार के समक्ष यह समस्या थी, कि भारत में कृषि योग्य भूमि का मालिक किसे मान जाय? सरकार राजस्व चुकाने के लिए अन्तिम रूप से किसे उत्तरदायी बनाये तथा उपज में से सरकार का हिस्सा कितना हो। वारेन हेस्टिंग्स ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा था, कि किसानों से लगान वसूल करने के बदले में ज़मींदारों के पास कुछ कमीशन प्राप्त करने के अधिकार हों। परन्तु हेस्टिंग्स की यह पद्धति असफल रही। 1772 ई. में हेस्टिंग्स ने पंचवर्षीय बन्दोबस्त चलाया। 1776 ई. में इस व्यवस्था को भी त्याग दिया गया। 1786 ई. में लॉर्ड कॉर्नवॉलिस बंगाल का गवर्नर-जनरल बना। उसने जेम्स ग्राण्ट एवं सर जॉन शोर से नवीन लगान व्यवस्था पर विचार विमर्श किया। 1790 ई. में कार्नवालिस ने दसवर्षीय व्यवस्था को लागू किया। 1793 ई. में इस व्यवस्था को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में स्थायी कर दिया गया और कालान्तर में इसे उत्तर प्रदेश के बनारस खण्ड एवं उत्तरी कर्नाटक में भी लागू किया गया।

महालवाड़ी व्यवस्था

महालवाड़ी व्यवस्था का प्रस्ताव सर्वप्रथम ‘हॉल्ट मैकेंजी’ द्वारा लाया गया था। इस व्यवस्था के अंतर्गत भूमि पर ग्राम समुदाय का सामूहिक अधिकार होता था। इस समुदाय के सदस्य अलग-अलग या फिर संयुक्त रूप से लगान की अदायगी कर सकते थे। सरकारी लगान को एकत्र करने के प्रति पूरा ‘महाल’ या ‘क्षेत्र’ सामूहिक रूप से ज़िम्मेदार होता था। महाल के अंतर्गत छोटे व बड़े सभी स्तर के ज़मींदार आते थे। महालवाड़ी व्यवस्था का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1819 ई. में ‘हॉल्ट मैकेंजी’ द्वारा लाया गया था। इस प्रस्ताव को 1822 ई. के रेग्यूलेशन-7 द्वारा क़ानूनी रूप प्रदान किया गया।

रैय्यतवाड़ी व्यवस्था

इस व्यवस्था में प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार भूमि का स्वामी होता था, जो सरकार को लगान देने के लिए उत्तरदायी होता था। इसके पास भूमि को रखने व बेचने का अधिकार होता था। भूमि कर न देने की स्थिति में उसे भूस्वमित्व के अधिकार से वंचित होना पड़ता था। इस व्यवस्था के अन्तर्गत सरकार का रैय्यत से सीधा सम्पर्क होता था। रैय्यतवाड़ी व्यवस्था को मद्रास तथा बम्बई एवं असम के अधिकांश भागों में लागू किया गया। रैय्यतवाड़ी भूमि कर व्यवस्था को पहली बार 1792 ई. में मद्रास के ‘बारामहल’ ज़िले में लागू किया गया। टॉमस मुनरो जिस समय मद्रास का गर्वनर था, उस समय उसने कुल उपज के तीसरे भाग को भूमिकर का आधार मानकर मद्रास में इस व्यवस्था को लागू किया। मद्रास में यह व्यवस्था लगभग 30 वर्षों तक लागू रही थी।

कृषि का व्यापारीकरण

ब्रिटिश भारत में पड़े अकाल
वर्ष अकाल प्रभावित क्षेत्र
18601861 ई. पंजाब, राजपूताना, उत्तर-पश्चिम प्रांत एवं कच्छ
18661867 ई. बंगाल, बिहार, उड़ीसा
18681869 ई. उत्तर प्रदेश, राजपूताना, पंजाब
18731874 ई. बिहार, बंगाल, मैसूर,हैदराबाद
18771878 ई. पंजाब, कश्मीर, उत्तर प्रदेश
18881889 ई. उड़ीसा, गंजाम
18901892 ई. पंजाब
18961897 ई. अवध, बंगाल, मद्रास, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बम्बई
18991900 ई. बरार, बम्बई, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बम्बई
19051906 ई. बम्बई
19061907 ई. उत्तर बिहार
19071908 ई. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बंगाल, मद्रास, बम्बई

अंग्रेज़ों द्वारा भारतीय कृषि के व्यापारीकरण के पीछे मुख्य उद्देश्य था- इंग्लैण्ड के उद्योगों के लिए कच्चे माल को उपलब्ध कराना। 1850 ई. तक भारत में उन वस्तुओं की खेती की जाती थी, जो मुख्यतः भारतीयों के उपभोग हेतु आवश्यक होती थी। परन्तु 1850 ई. के बाद अंग्रेज़ी सरकार ने उन्ही वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहन दिया, जिनका उपयोग ब्रिटेन के उद्योगों में कच्चे माल के रूप में हो सकता था। ब्रिटिश सरकार भारत को अपने सामानों की मंडी तथा कच्चा माल भेजने वाले एक उपनिवेश की भूमिका के लिए तेयार कर रही थी। इस नीति के तहत ब्रिटिश सरकार ने भारतीय किसानों को ऊँची क़ीमत देने का प्रलोभन देकर कपास, जूट, नील, कॉफ़ी, चाय, मूंगफली, गन्ना जैसे वाणिज्यिक फ़सलों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहन दिया। सरकार द्वारा सर्वाधिक ध्यान कपास की खेती पर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप गेंहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा जैसे खाद्यानों का अभाव हो गया, जिससे यहाँ भुखमरी फैल गयी। फ़सलों के वाणिज्यीकरण के फलस्वरूप ही तत्कालीन समय में भारत को कई अकालों का सामना करना पड़ा।

  • जॉन सुलविन के कथन के अनुसार, “हमारी प्रणाली एक ऐसे स्पंज के रूप में काम करती है, जो गंगा के किनारों से प्रत्येक अच्छी वस्तु को ले लेती है और टेम्स के किनारे पर निचोड़ देती है।”

किसानों का शोषण

1850 ई. के बाद देश में रेलों की व्यवस्था ने भी वाणिज्यिक फ़सलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया। इस सुविधा का लाभ उठाकर भारतीय किसान अब विश्व बाज़ार से सम्पर्क साधने लगे। नक़द पैसे के लालच में भारतीय किसान अपनी फ़सलों को निम्न दर पर बेचने लगा, जिससे उसके शोषण को बढ़ावा मिला। व्यापारिक फ़सलों की खेती करने से निःसंदेह कुछ किसानों की स्थिति पहले से बेहतर हुई, परन्तु देश में खाद्यान्नों के अभाव के कारण इनके मूल्य में भयंकर वृद्धि हुई।

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था

अंग्रेज़ों द्वारा भारत का किया गया शोषण तीन कालों में बाँटा जा सकता है- प्रथम काल 1756 ई. से 1812 ई. तक माना जाता है। इस समय अर्थव्यवस्था में व्यापारिक पूंजी का साम्राज्य था। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने व्यापार पर पूर्ण अधिकार रखा था। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारी जी भरकर भारत को लूट रहे थे। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार ‘पर्सिवल स्पीयन’ ने टिप्पणी की है, “अब बंगाल में खुला तथा बेशर्म लूट का काल आरम्भ हुआ।” वे कम दाम पर भारतीय वस्तुओं को क्रय कर इंग्लैण्ड निर्यात कर देते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार ‘के.एम.पणिक्कर’ ने 1765 ई. से 1772 ई. के काल को ‘डाकू राज्य’ कहा है। द्वितीय काल अर्थात 1813 ई. से 1857 ई. के मध्य मुक्त व्यापार एवं पूंजी के साम्राज्यवाद का काल था। इस समय का भारत ब्रिटेन से निर्मित वस्त्रों के लिए बाज़ार एवं कच्चे माल के स्रोत के रूप में प्रसिद्ध था। इस काल में भारत के कुटीर एवं लघु उद्योगों का पतन हुआ। इस संदर्भ में कार्ल मार्क्स ने कहा था, “सूती कपड़ों के घर में सूती कपड़ों की भरमार कर दी गई है।” तृतीय काल अर्थात 1857 ई. से 1947 ई. के मध्य वित्तीय पूंजी का साम्राज्यवाद भारत में अपनी जड़ें जमाने का प्रयत्न करने लगा। तात्पर्य यह है कि अंग्रेज़ों द्वारा यहाँ के उद्योगों में भारी मात्रा में पूंजी निवेश किया जाने लगा।

भारतीय धन की निकासी

प्रश्न उठता है कि, धन का निष्कासन क्या है? “जब किसी देश के धन को उस देश से बाहर भेजा जाता था, तथा बदले में उस देश को कुछ भी प्राप्त नहीं होता था, तो धन के इस बहिर्गमन को ही धन की निकासी कहा जाता था।” भारत में धन की यह निकासी पश्चिमी देशों की ओर धात्विक मुद्रा के रूप में कम, परन्तु वस्तुओं की निर्यात के रूप में अधिक हुई। वैसे आयात से अधिक निर्यात करने वाले देश को आर्थिक रूप से सम्पन्न माना जाता है, परन्तु भारत के निर्यात का चरित्र कुछ दूसरा ही था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी जो भी राजस्व भारत में एकत्र करती थी, उसी से वस्तुओं को क्रय कर अपने देश को निर्यात करती थी। 1850 ई. के बाद अंग्रेज़ों ने भारत से कुछ नई वस्तुओं, जैसे पश्चिमी भारत से कपास, पंजाब से गेंहूँ, असम से चाय, दक्षिण भारत से तिहलन, बंगाल से पटसन, चमड़ा एवं खालों का निर्यात करना प्रारम्भ कर दिया। 1858 ई. के बाद हुए संवैधानिक सुधारों के कारण कम्पनी के हिस्से का ऋण एवं उसकी समस्त देनदारियाँ अब भारत सरकार के हिस्से में आ गईं। अब ब्रिटिश भारत के सभी अधिकारियों की पेंशनें, इंग्लैण्ड से भारत के लिए ख़रीदे जाने वाले सैनिक साज-समान, सैनिकों के प्रशिक्षिण पर होने वाले व्यय, परिवहन पर व्यय, भारत की सीमाओं से बाहर किये जाने वाले अभियानों पर आने वाले व्यय आदि भारत सरकार पर ही भारित थे। इन सभी साधनों के द्वारा भारत का धन जिस प्रकार से ब्रिटेन की ओर जा रहा था, उसी को धन की निकासी के नाम से जाना गया।

दादाभाई नौरोजी

Main.jpg मुख्य लेख : दादाभाई नौरोजी

1868 ई. में सर्वप्रथम दादाभाई नौरोजी ने अंग्रेज़ों द्वारा भारत के ‘धन की निकासी’ की ओर सभी भारतीयों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने 2 मई, 1867 ई. को लंदन में आयोजित ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ की बैठक में अपने पत्र, जिसका शीर्षक ‘England Debut To India’ को पढ़ते हुए पहली बार धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा- “भारत का धन ही भारत से बाहर जाता है, और फिर धन भारत को पुनः ऋण के रूप में दिया जाता है, जिसके लिए उसे और धन ब्याज के रूप से चुकाना पड़ता है। यह सब एक दुश्चक्र था, जिसे तोड़ना कठिन था।” उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Poority And Unbritish Rules In India’ में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय का अनुमान 20 रुपये लगाया था। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य पुस्तकें, जिसमें उन्होंने धन के निष्कासन सिद्धान्त की व्याख्या की है, ‘द वान्ट्स एण्ड मीन्स ऑफ़ इण्डिया (1870 ई.)’, ‘आन दि कामर्स ऑफ़ इण्डिया (1871 ई.)’ आदि हैं। दादाभाई नौरोजी ‘धन के बहिर्गमन के सिद्धान्त’ के सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रखर प्रतिपादक थे। 1905 ई. में उन्होंने कहा था कि, “धन का बहिर्गमन समस्त बुराइयों की जड़ है, और भारतीय निर्धनता का मुख्य कारण।” दादाभाई नौरोजी ने धन निष्कासन को ‘अनिष्टों का अनिष्ट’ की संज्ञा दी है।

  • महादेव गोविन्द रानाडे ने कहा है, “राष्ट्रीय पूँजी का एक तिहाई हिस्सा किसी न किसी रूप में ब्रिटिश शासन द्वारा भारत से बाहर ले जाया जाता है।”

भारतीय धन निकासी का परिणाम

भारत में प्रति व्यक्ति आय का अनुमान
व्यक्ति अनुमानित रुपये
दादाभाई नौरोजी (1867-1870 ई.) 20 रुपये प्रति वर्ष
एलविन बेरिंग और डेविड बेलफ़र (1882 ई.) 27 रुपये प्रति वर्ष
लॉर्ड कर्ज़न (1901 ई.) 30 रुपये प्रति वर्ष
विलियम डिग्बी (1899 ई.) 18 रुपये प्रति वर्ष
डॉ. वी.के.आर.वी.राव (1931-1932 ई.) 62 रुपये प्रति वर्ष

भारतीय धन की निकासी के विषय में आर.सी.दत्त ने कहा, “भारतीय राजाओं द्वारा कर लेना तो सूर्य द्वारा अपनी भूमि से पानी लेने के समान था, जो कि पुनः वर्षा के रूप में भूमि पर उर्वरता देने के लिए वापस आता था, पर अंग्रेज़ों द्वारा लिया गया कर भारत में वर्षा न करके इंग्लैण्ड में ही वर्षा करता था।” रमेश चन्द्र दत्त ने अपनी पुस्तक ‘इकोनोमिक हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया’ (1901 ई.) में धन के बहिर्गमन का उल्लेख किया है। इस पुस्तक को भारत के आर्थिक इतिहास पर पहली प्रसिद्ध पुस्तक माना जाता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपने ‘कलकत्ता अधिवेशन’ (1896 ई.) में सर्वप्रथम ‘धन के निष्कासन’ सिद्धान्त को स्वीकार किया गया। 1901 ई. में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के बजट पर भाषाण देते हुए गोपाल कृष्ण गोखले ने ‘धन के बहिर्गमन’ सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। भारत में धन के निष्कासन की ओर सर्वप्रथम ध्यान दादाभाई नौरोजी का गया था और उन्होंने उसके दूरगामी प्रभाभों को समझा। लगातार धन की निकासी का परिणाम यह हुआ कि, भारतीयों पर कर का बोझ बढ़ गया। दादाभाई नौरोजी ने भारत की वास्तविक गरीबी का कारण भारतीय धन की निकासी को ही माना। उन्होंने ब्रिटिश शासन से पूर्व की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि, मुग़लों एवं तुर्कों ने भारत को अवश्य ही लूटा, परन्तु उस धन का उपयोग देश के भीतर ही किया गया, भले ही वह धन सुल्तानों और बादशाहों के व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं पर ख़र्च किया गया हो, परन्तु अंग्रेज़ों ने भारतीय धन को इतनी दूर ले जाकर ख़र्च किया कि, उसका कोई भी लाभ हमें नहीं मिल सका।

हस्तशिल्प उद्योग का ह्रास

जहाँ एक ओर इंग्लैण्ड में हुई औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप विश्व में औद्योगीकरण की प्रक्रिया गति पकड़ रही थी, वहीं दूसरी ओर भारत में इसका कुप्रभाव देखने को मिल रहा था। 1800-1850 ई. के मध्य के समय को भारत के ‘प्राक् औद्योगिकीकरण’ के काल के नाम से जाना जाता है। इस काल में भारत के हस्तशिल्प एवं कुटीर उद्योगों का पतन हुआ। सूती कपड़े एवं अन्य हस्तशिल्प की वस्तुओं पर 70 से 80 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगा दिया गया। भारत में मुक्त व्यापार के अधिकार के साथ ही यहाँ पर विदेशी लोगों ने उद्योग लगाना प्रारम्भ कर दिया। अंग्रेज़ों की इस नीति के कारण यहाँ पर ब्रिटेन में निर्मित सूती वस्त्र छा गये। यहाँ के बुनकरों और शिल्पियों को अपनी तकनीक का रहस्य बताने के लिए बाध्य किया गया। कालान्तर में यह वर्ग मात्र बंधुआ मजदूर बनकर रहा गया। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुए स्वदेशी आन्दोलनों के फलस्वरूप इन उद्योगों को थोड़ा बहुत संरक्षण प्राप्त हुआ। कुटीर उद्योग एवं हस्तशिल्प उद्योगों के ह्रास के कारण भारतीय जनसंख्या की निर्भरता कृषि पर बढ़ने लगी। कृषि की निर्भरता को ‘रजनी पामदत्त’ ने आंकड़ों द्वारा प्रस्तुत किया है।

आधुनिक उद्योगों का विकास

एक ओर भारतीय हस्त उद्योगों का विनाश हो रहा था, वहीं दूसरी ओर कुछ नये उद्योगों का जन्म भी हो रहा था। भारत में आधुनिक उद्योगों का प्रारम्भ 1850 ई. में हुआ। इन नये प्रकार के  उद्यागों का विकास दो रूपों – बाग़ान उद्योग एवं कारख़ाना उद्योग में हुआ। अंग्रेज़ों ने यहाँ सबसे पहले नील, चाय, कहवा आदि में विशेष रुचि ली। 1875 ई. के बाद कारख़ाना उद्योग का विकास हुआ, जिसमें कपास, चमड़ा, लोहा, चीनी, सीमेंट, काग़ज़, लकड़ी, काँच आदि उद्योग शामिल थे। भारत में प्रथम सूती वस्त्र उद्योग ‘बाम्बे स्पिनिंग एण्ड विविंग कम्पनी’ के नाम से पारसी उद्योगपति ‘कावसजी डाबर’ ने 1854 ई. में स्थापित किया। भारत में पहला चीनी कारख़ाना 1909 ई. में पहला जूट कारख़ाना 1855 ई. में बंगाल में खोला गया। पहली बार आधुनिक इस्पात तैयार करने का प्रयास 1830 ई. में मद्रास के दक्षिण में स्थित अर्काट में ‘जोशिया मार्शल हीथ’ द्वारा किया गया। लौह उद्योग क्षेत्र में अगला प्रयास 1907 ई. में जमशेद जी टाटा ने किया। इनके प्रयत्नों द्वारा ‘टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी’ की स्थापना की गई। इस प्रकार क्रम से इन उद्योगों का धीरे-धीरे विकास होता रहा।

कारख़ाना अधिनियम

कारख़ाना अधिनियम
वर्ष व्यक्ति
1881 ई. का कारख़ाना अधिनियम लॉर्ड रिपन
1891 ई. का कारख़ाना अधिनियम लॉर्ड लैन्सडाउन
1911 ई. का कारख़ाना अधिनियम लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय
1922 ई. का कारख़ाना अधिनियम लॉर्ड रीडिंग
1934 ई. का कारख़ाना अधिनियम लॉर्ड विलिंगडन
1946 ई. का संशोधित कारख़ाना अधिनियम लॉर्ड वेवेल

ब्रिटिश भारत में समय-समय पर कई कारख़ाना अधिनियम पारित किय गए। उनका विवरण इस प्रकार से है-

1881 ई. का कारख़ाना अधिनियम

लॉर्ड रिपन के समय में लाये गये इस कारख़ाना अधिनियम में अल्पायु श्रमिकों को संरक्षण एवं उनके स्वास्थ्य सुरक्षा की व्यवस्था की गई। यह अधिनियम उन कारख़ानों पर ही लागू हो सकता था, जहाँ पर श्रमिकों की संख्या कम से कम 100 होती थी। अधिनियम में 7 वर्ष से कम बच्चों को काम करने से प्रतिबंधित किया गया तथा 7 से 12 वर्ष के बच्चों के काम की अवधि 9 घण्टें तय की गई थी। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन एक घण्टे का आराम तथा महीने में 4 दिन की छुट्टी की व्यवस्था की गई।

1891 ई. का कारख़ाना अधिनियम

लॉर्ड लैन्सडाउन के समय में लाये गये इस कारख़ाना अधिनियम में वयस्क श्रमिकों के लाभ की व्यवस्था की गई थी। यह अधिनियम उन सभी स्थानों पर लागू हुआ, जहाँ पर कम से कम 50 श्रमिक एक साथ काम करते थे। इस अधिनियम में 9 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारख़ानों में कार्य करने से पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया और 9 से 19 वर्ष के बच्चों के कार्य की अवधि को 7 घण्टे प्रतिदिन निश्चित कर दिया गया। महिलाओं को रात्रि के समय 8 बजे से सुबह 5 बजे तक काम करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। इनके काम करने की अवधि को 11 घण्टे प्रतिदिन तय किया गया। सप्ताह में एक दिन अवकाश की घोषणा की गई।

1911 ई. का कारख़ाना अधिनियम

1891 के कारख़ाना अधिनियम को ही संशोधित कर 1911 ई. में एक अन्य कारख़ाना अधिनियम प्रस्तुत किया गया, जिसमें पुरुषों के कार्य करने की अवधि को 12 घन्टे प्रतिदिन निश्चित किया गया। अल्पायु बच्चों को कारख़ानों में 7 बजे सन्ध्या से 5 बजे सुबह के बीच कार्य करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यह अधिनियम लॉर्ड हार्डिंग के समय लाया गया था।

1922 ई. का कारख़ाना अधिनियम

लॉर्ड रीडिंग के समय में लाया गया यह कारख़ाना अधिनियम उन स्थानों पर लागू होता था, जहाँ पर 20 से अधिक श्रमिक काम करते थे, अथवा बिजली का प्रयोग किया जाता था। इस अधिनियम में कारख़ाने में कार्य करने की बच्चों की आयु को बढ़ाकर 12 से 15 वर्ष के बीच निश्चित किया गया और इनके कार्य करने की अवधि को कम कर 6 घण्टे प्रतिदिन कर दिया गया। इस अधिनियम को 1923,1926 और 1931 ई. में आंशिक रूप से संशोधित किया गया था।

1934 ई. का कारख़ाना अधिनियम

लॉर्ड विलिंगटन के समय में लाये गये इस कारख़ाना अधिनियम में मौसमी कारख़ाने एवं सदैव कार्यरत कारख़ानों में अन्तर स्थापित किया गया। वयस्क श्रमिकों के काम के घण्टों को 11 घन्टा प्रतिदिन तय किया गया। नियमित रूप से कार्य करने वाले उद्योगों या कारख़ानों में व्यस्क श्रमिकों के दैनिक कार्य की अवधि को 10 घण्टे निश्चित किया गया और साथ ही श्रमिकों के आराम एवं उनकी चिकित्सा की भी व्यवस्था की गई।

1946 ई. का कारख़ाना संशोधन अधिनियम

लॉर्ड वेवेल के समय में 1934 ई. के कारख़ाना अधिनियम को संशोधित कर प्रस्तुत किया गया। इस संशोधित अधिनियम में श्रमिकों के कार्य करने की अवधि को 11 से कम करके 9 घण्टे किया गया। 200 से अधिक श्रमिकों के कार्य करने वाले कारख़ानों में कैण्टीनों की व्यवस्था पर बल दिया गया।

उपर्युक्त सभी कारख़ाना अधिनियम ऐसे समय में लाये गये, जब भारत ग़ुलाम था। इसलिए श्रमिकों की सुविधाओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। स्वतंत्र भारत का पहला विस्तृत कारख़ाना अधिनियम 1948 ई. में लाया गया, जिसमें श्रमिकों की बदतर स्थिति को बेहतर करने को सच्चे मन से प्रयास किया गया।

ब्रिटिश काल में भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी कुछ प्रथायें

  1. ददनी प्रथा – इस प्रथा के अन्तर्गत ब्रिटिश व्यापारी भारतीय उत्पादकों, कारीगरों एवं शिल्पियों को ‘अग्रिम संविदा’ (पेशगी) के रूप में दे देते थे।
  2. कमियौंटी प्रथाबिहार एवं उड़ीसा में प्रचलित इस प्रथा के अन्तर्गत कृषि दास के रूप में खेती करने वाले कमियाँ जाति के लोग अपने मालिकों द्वारा प्राप्त ऋण पर दी जाने वाली ब्याज की राशि के बदले जीवन भर उनकी सेवा करते थे।
  3. तिनकठिया प्रथा – इस प्रथा के अन्तर्गत ‘चम्पारन’ (बिहार) के किसानों को अपने अंग्रेज़ बाग़ान मालिकों के अनुबन्ध पर अपनी ज़मीन के क़रीब 3/20 भाग पर नील की खेती करना अनिवार्य होता था।
  4. दुबला हाली प्रथाभारत के पश्चिमी क्षेत्र, मुख्यतः सूरत में प्रचलित इस प्रथा के अन्तर्गत ‘दुबला हाली भू-दास’ अपने मालिकों को ही अपनी सम्पत्ति का और स्वयं का संरक्षक मानते थे।

 

 

 
 
 
 
 
 

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