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क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो – राम धारी सिंह दिनकर

शक्ति और क्षमा / रामधारी सिंह “दिनकर”

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क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा

पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही

दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही।
अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है

पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल होदिनकर

उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो।
तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे,

बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से

उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में

चरण पूज दासता ग्रहण की बँधा मूढ़ बन्धन में।
सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की

सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है

बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।

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3 Responses to “क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो – राम धारी सिंह दिनकर”

  1. September 9, 2013 at 8:48 pm #

    वीर रस की कविता का प्रकाशन करने के लिए अत्यंत आभार,,इतिहास साक्षी है बल शाली के सन्मुख की संसार नतमस्तक होता आया है,,वर्तमान भारत में हिन्दू समाज को वुधि और विवेक से संगठित हो कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना होगा, वरना कायर तो सदियों से इस्लाम ग्रहण करता आया है और भविष्य में भी करता रहेगा, परन्तु कायरतापूर्ण आत्म समर्पण से सनातन संस्कृति का विनाश अवश्य सम्भव है,

  2. Dr. Sharad Joglekar
    September 17, 2013 at 12:18 am #

    Wonderful message.
    Thanks,
    Sharad Joglekar.

  3. राजकुमार
    April 23, 2018 at 9:30 pm #

    दिनकर जी की महानता का कोई सानी नहीं

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