4:21 pm - Wednesday November 22, 2017

घाटी मे कोलाहल है, कोलाहल है गद्दारों का*

घाटी मे कोलाहल है, कोलाहल है गद्दारों का*

a poem taken from e mail , author not know

n Indian Flag-burning kashmiris

 

घाटी मे कोलाहल है, कोलाहल है गद्दारों का*
*मौसम बना हुआ है देखो आतंकी त्यौहारों का*
*मौत हुई है आतंकी की लाखों चेहरे रोए हैं*
*हम तो केवल दाल टमाटर के भावों मे खोए हैं*
*आतंकी का एक जनाजा मानो कोई जलसा है*
*लाखों लोग उमड़ आए हैं जैसे कोई फरिश्ता है*
*सेना पे पथराव किया है अफ़जल के दामादों ने*
*फिर से थाने फूँक दिए हैं धरती के जल्लादों ने*
*सीधा मतलब साथ निभाने वाले भी आतंकी है*
*इन सबकी वजह से पूरी घाटी ही आतंकित है*
*दूध पिलाना बंद करो अब आस्तीन के साँपों को*
*चौराहों पे गोली मारो साठ साल के पापों को*
*सौ सौ बार नमन् सेना को डटी रही है घाटी मे*
*आतंकी को मिला रही है काट काट के माटी मे*
*सेना को अब आतंको की छाती पे चढ़ जाने दो*
*साथ निभाने वालों पे भी अब गोली बरसाने दो*
*एक बार अब श्वेत बर्फ पे लाल रंग चढ़ जाने दो*
*लाश बिछा दो गद्दारों की सेना को बढ़ जाने दो*
*एक परीक्षण नये बमों का गद्दारों पे कर डालो*
*दहशतगर्दों के सीने मे तुम भी दहशत भर डालो*
*भूलो गिनती गद्दारों की लाश बिछाना शुरू करो*
*वंदे मातरम् भारत माँ की जय तराने शुरू करो*
*देशप्रेमियों की सैनिकों पूरी मन्नत कर डालो*
*नर्क भेज के गद्दारों को भूमि जन्नत कर डालो.*🇮🇳🙏

Filed in: Literature

No comments yet.

Leave a Reply