11:51 pm - Tuesday September 26, 2017

देश मैं दाल की कमी करा कर पुनः मंहगाई बढाने का षड्यंत्र : प्रधानमंत्री तुरंत जांच कर रुकवाएं

देश मैं दाल की कमी करा कर पुनः मंहगाई बढाने का षड्यंत्र : प्रधानमंत्री तुरंत जांच कर रुकवाएं

Rajiv Upadhyay RKU

जब से खाद्यान्नों पर से बैंकों  के कर्जे देने की प्रक्रिया शुरू हुयी है देश की खाद्यान व्यवस्था पर लालची व्यपारी पुनः हावी हो गए हैं . भर्ष्टाचार के बोलबाले से उन्होंने २००५ – ६ मैं गेहूं के दाम बेतहाशा बढ़ा कर मनमोहन सरकार को असहाय कर दिया और पांच साल तक जनता मंहगाई की मार झेलती रही . अंत मैं वह सरकार ही डूब गयी .इसी तरह मोदी सरकार के आते ही बाबुओं ने आयात मैं देरी कर जो दाल के दाम बढाए थे उनको सँभालने मैं दो वर्ष लग गए . अब फिर दाल की दो साल बाद कमी करा के मंहगाई बढाने वाले फैसले लिए बाबुतंत्र द्वारा लिए जा रहे हैं जिससे दाल आयात करने वाले व्यापारियों की चांदी हो सके .मज़ा यह की इतनी चालाकी से काम करा जाता है की किसी को समझ ही नहीं आता की इसके पीछे कौन है .

२०१४ की दाल की कीमतों के बढ़ने से मोदी सरकार ने दाल का समर्थन मूल्य बढ़ा कर ५५ रूपये क़ुइन्त्ल कर दिया . यह स्वागत योग्य कदम था क्योंकि दाल का आयात बहुत बढ़ गया था .किसानों को इस से अधिक दाल की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने का उद्देश्य था . परन्तु बढ़ी उपज से आयात कम हो जाता तो व्यापरियों ने इस वर्ष खाद्य मंत्रालय से सांठ गाँठ कर इस साल अरहर  दाल का समर्थन मूल्य समाप्त करवा दिया . इससे बढ़ी उपज के बावजूद किसान अपनी दाल की पैदावार बेच नहीं पायेगा

इससे लालची व्यापारियों को दो फायदे होंगे . एक तो वह सस्ती दाल खरीद कर बाद मैं उसे मंहगा कर देंगे . दुसरे अगले साल दुखी किसान द्वारा कम दाल बोई जायेगी जिससे दो वर्ष बाद दाल की बहुत कमी हो जायेगी और फिर से दाल आयात करने वाले व्यापारियों की चांदी हो जाएगी . इन्ही चालों से व्यापारियों ने दाल के मुनाफे को दो गुना बढ़ा दिया है जो ग्राफ मैं प्रदर्शित है  . परन्तु ठीक इसी तरह इसके पहले 2005- 6 मैं गेहूं के साथ यही खिलवाड़ कर उन्होंने मनमोहन सरकार को हतप्रभ कर दिया था जिससे सरकार कभी उबार ही नहीं पायी . उस की पूरी कहानी नीचे दिए लिंक व् लेख पर पढ़ें  .

How Wheat Crisis Was Created

http://rupe-india.org/42/crisis.html

प्रश्न यह है की दाल का उत्पादन बढ़ाना देश के दूर गामी हित मैं है . यदि दाल का स्टॉक बढ़ गया था उसका आयात बंद करना चाहिए था . दाल का समर्थन मूल्य समाप्त करना तो आत्महत्या है . क्यों व्यापारियों के लालच मैं २०१९ की सरकार की बलि चढ़ाई जा रही है . इसका सरल उत्तर यह है की इंदिरा गांधी का खाद्यान्नों पर बैंक लोन न देना ही ठीक नीति थी . जब से यह नीति बदली है तब से लालची व्यापारी कभी गेहूं तो कभी सब्जी या दाल का मूल्य बढाते ही रहते हैं . बाबुतंत्र इसमें सदा सहायक बन जाएगा क्योंकि आता पैसा किसे बुरा लगता है . हमारे भ्रष्ट तंत्र मैं लालची व्यापारी व् चालाक बाबुओं के इस गठबंधन को नहीं रोका जा सकता . पिछली बार गेंहूँ के दाम बढाने मैं  शरद पवार की भूमिका पर बहुत प्रश्न उठे थे .परन्तु राजनीती के मंजे खिलाड़ी होने के कारण उनका कुछ नहीं बिगड़ा .whole-sale-retail-dal-price-231x300per-capita-daal-consumption-150x150

इस साल दाल की दुर्गति करने की पूरी गाथा rediff नीचे दिए लेख मैं पढ़ें . उसके नीचे  नीचे दाल की २०१४ की व् गेहूं की २००५-६ की कहानी पढ़ें .

मोदी सरकार को तुरंत इस राष्ट्र विरोधी  फैसले को बदलना चाहिए  और गरीब के हित मैं इंदिरा गाँधी का ठीक फैसला बहाल कर देना चाहिए और बैंकों को खाद्यान्नों के भंडारण के लिए व्यापारियों को दिए जाने वाले कर्जे पर रोक लगा देनी चाहिए .

 

Why tur dal has suddenly become CHEAPER – rediff

FCI’s suspension of tur under MSP is likely to force farmers to undergo distress sales of the commodity.

Government-owned food grains procurement agency, Food Corporation of India (FCI), has suspended purchase of pulses from farmers under the minimum support price (MSP) operations for the current season.

The FCI claims that it had surpassed the pulse procurement target fixed by the Ministry of Consumer Affairs in the beginning of the season and is now looking for ways to dispose its stock. Farmers, however, are feeling trapped as pulse prices continue to slump, falling over 25 per cent below the minimum support price (MSP) in the open market.

As against an MSP of Rs 5,050 a quintal, tur is selling at Rs 4,000-4,200 in the open markets.

FCI’s suspension of tur under MSP is likely to force farmers to undergo distress sales of the commodity. Many farmers held their inventory after harvesting for the current season amid expectations of a recovery in prices following supply deficiency.

 

Since, India meets around 23 per cent of its annual pulses demand through imports, farmers’ strategy of holding stocks for better realisation makes sense.

“Effective April 22, we have stopped purchase of pulses for the current season after surpassing the government’s target. Now, we are looking to slow our pulse procurement in the forthcoming rabi season,” said a senior FCI official.

According to the official, the Ministry of Consumer Affairs had set a procurement target of two million tonnes of pulses for the current season. As per the plan, FCI distributed the stocks it procured for kharif and rabi season to the extent of 1.55 million tonnes and 0.45 million tonnes respectively.

Informed sources said that the government agency surpassed the target for the current kharif season, procuring over 1.1 million tonnes of tur alone, and over 0.45 million tonnes of other varieties.

The agency has now started auctioning pulses. As per the official, FCI would give first preference to departments under the Ministry of Defence, such as paramilitary forces and other departments to dispose off the procured pulses, mainly tur.

It has also initiated dialogues with some state governments for selling its stock of pulses which, according to the official, would be the second priority. The third and last priority, however, would be market intervention i.e. selling in the open market which often takes place when the price firms up suddenly.

 

Meanwhile, farmers feel trapped in the price fall saga. After tur dal surpassed Rs 200 a kg in the retail markets last year, the local government of many states encouraged farmers to bring in additional area under pulses to fetch extra incomes. Tur dal is selling at Rs 60-65 a kg today.

 

“Farmers felt that the government would ensure at least Rs 5,050 a quintal for tur and that there would be an underwritten price for other pulses as well. However, the government agencies are no longer procuring. This would force farmers to sell their stocks at lower prices,” said a senior Mumbai-based pulses trader and importer.

 

Meanwhile, traders have started making the most of the situation. They have started offering Rs 3,000–3,200 a quintal to tur farmers. Pulse prices declined this year following forecast of a sharp increase in local output.

 

The Ministry of Agriculture forecasts 4.23 million tonnes of tur output for the current season compared to 2.56 million tonnes for 2015-16. The overall pulse output in India is estimated to remain at 22.14 million tonnes for 2016-17, compared with 16.35 million tonnes last year. India imported around 5.5 million tonnes of pulses in FY 2016-17.

 

दाल में बहुत कुछ काला है : देश की सरकारों की बेरुखी का पूर्ण सत्य जानिए – Patriots Forum

 

 

 

दाल में बहुत कुछ काला है : देश की सरकारों की बेरुखी का पूर्ण सत्य जानिए

 

राजीव उपाध्यायRKU

 

आज अरहर दाल की कीमत २३० रूपये किलो तक पहुँच गयी है और देश मैं त्राहि त्राहि मची हुयी है . सरकारी तंत्र एक दुसरे पर दोषारोपण कर रहा है . केंद्र राज्यों को जमाखोरी न रोक पाने के लिए दोषी ठहरा रहा है . पूरी सरकार की इस फजीहत से प्रधान मंत्री जी की कार्य शैली की सफलता पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है .

 

आखिर वर्षों से दाल की समस्या इतनी विकराल तो नहीं थी तो अब क्या हो गया जो न केवल सारी की सारी दाल ही काली हो गयी परन्तु यह कालिख सरकार के मुंह पर भी पुत गयी ? २००७ से सरकार ने MMTC,STC,PEC& NAFED ओ दल आयात करने की जिम्मेवारी दी थी .यह सब समय पर दाल आयात कर ठीक ठाक काम कर रही थीं .सरकार ने दाल के आयात पर सब्सिडी भी दी . इन कंपनियों को सस्ती दल बेचने से १२०० करोड़ का घाटा होता था जो सरकार पूरा कर देती थी .

 

यदि मात्र इस वर्ष की बात करें तो समस्या यह है कि दाल के उत्पादन करने वाले क्षेत्रों मैं बारिश कम हो गयी . इससे दल का उत्पादन १९.२५ मि टन से घट कर १७.३८ मि टन रह गया . दाल की खपत २२ मिलियन टन की है. सरकार को यह पता होना चाहिए था व् दाल का आयात का आदेश बहुत पहले दे देना चाहिए था . पर बाबुओं को तो अपनी जान बचानी है इसलिए टेंडर मैं कोई खामी होने से उसे दुबारा करने का निर्णय लिया . उसमें भी बाबुओं की सीबीआई से रक्षा वाले पहले वाले कानून होते तो शायद कोई हिम्मत भी कर लेता की बाज़ार भाव पर एक मिलियन टन दाल और आयात कर लेता . पर भारत ही दालों का प्रमुख उत्पादक व् उपभोक्ता है . विश्व मैं दालों का उत्पादन बहुत अधिक नहीं है और कुल विशव का निर्यात मात्र १६ मिलियन टन ही है . भारत मैं दाल के उत्पादन मैं यदि कमी हो जाय तो विश्व मैं कीमतें बहुत बढ़ जाती हैं . बढ़ी कीमतों पर इतनी दाल कौन खरीदता. उधर थोक के व्यापारियों ने एक बड़ा पैसा बनाने का मौक़ा ताड़ लिया . यह कोई नहीं पूछ रहा की जब थोक के भाव नहीं बढ़ रहे तो खुदरा भावों में क्यों आग लग गयी .उत्तर स्पष्ट है की बिचौलिए व् जमाखोरों की चांदी हो गयी है . सरकारी छापे कितनी दुकानों पर पड़ेंगे ?

 

इसका इलाज़ इंदिरा गाँधी ने समझ लिया था व् बैंकों को खाद्यान के भण्डार के लिए क़र्ज़ देने पर रोक लगा दी थी . जब से यह रोक हटी है तबसे जनता खून के आंसू पी रही है . नीचे के ग्राफ से साफ़ है की थोक और खुदरा मूल्यों में अंतर बैंक क़र्ज़ खुलने के बाद से बहुत बढ़ गया है . इसलिए इस बड़ी हुयी मुनाफाखोरी की जिम्मेवार मात्र सरकार है .

 

 

 

 

 

सरकार जानते हुए भी खाद्यान भंडारण के लिए पर बैंकों के कर्जों पर इंदिरा गाँधी की तरह रोक नहीं लगा रही . इसलिए अब कभी प्याज सरकार को रुलाएगा तो कभी दाल कभी कुछ और . तिस पर रिज़र्व बैंक इन जमाखोर व्यपारियों के चलते उद्योगों को कर्जा महंगा कर और नैया डुबो रहा है . एक तरफ महंगाई और दूसरी तरफ नौकरियों का अकाल ? कौन बचाएगा इससे, सरकारी बाबु ?

 

सरकार कोयला घोटाला मैं उच्च अफसरों को फंसा कर देश को अंततः नुक्सान ही हुआ.

 

डरा बड़ा बाबु तो मरा बड़ा बाबु होता है . बड़े फैसलों के लिए बड़े साहस की जरूरत होती है. यदि साहसिक फैसले लेंगे तो गलतियां भी होंगी .उनपर जान लेंगे तो फिर क्यों साहस दिखाएगा .इस सीबीआई / विजिलेंस राज को बंद करना होगा नहीं तो ऐसी समस्याएं आती रहेंगी .

 

परन्तु दाल की वास्तविक समस्या इस वर्ष की ही तो कम उपज नहीं है ? यह तो एक लम्बी कहानी है जिस मैं अनेकों खलनायक हैं .

 

वास्तव मैं शाकाहारी भारत मैं जो शरीर के विकास के लिए आवश्यक प्रोटीन के लिए दाल पर निर्भर है , १९६० से पिछले पचास वर्षों मैं प्रति व्यक्ति दाल की खपत सन १९६० में ७० ग्राम प्रति दिन प्रति व्यक्ति से घट कर सन २००९ में मात्र ३९ ग्राम रह गयी है . इसलिए औसतन भारतीय की लम्बाई बढ़ने के बजाय घटेगी . यह कमी इस लिए हुई की भारत मैं सब तरह की दालों का उत्पादन इस समयावधि में ५.५ मि टन से बढ़ कर ६.७५ मि टन हुआ जब की आबादी ढाई गुनी बढ़ गयी . देश ने दाल का आयात करना शुरू कर दिया पर आयात तो महंगा होता है . इसलिए दाल के दाम बढ़ते गए . यु पी ए – २ सरकार मैं जब मन आया तो आयात खोल दिया और जब मन आया तो बंद कर दिया की नीति अपनाई . कोई दाल का भण्डार नहीं बनाया . इसलिए विश्व मैं और भारत मैं किसान दाल की खेती बढाने के लिए उत्साहित नहीं हुए .

 

परन्तु गेहूं या चावल मैं तो ऐसा नहीं हुआ . आज भारत गेंहूँ व् चावल दोनों का निर्यात कर रहा है . चावल के तो हम विश्व के सबसे बड़े निर्यातक देश हैं . तो फिर दाल ही में क्यों फिस्सडी रह गए ?

 

वास्तव मैं नेहरूजी के समय में वैज्ञानिक बोर्लौग द्वारा गेहूं की ज्यादा पैदावार वाली किस्में विकसित करने पर ध्यान दिया जा रहा था . हरित क्रांति ने गेहूं का उत्पादकता को बहुत बढ़ा दिया . ऊपर से समर्थन मूल्य इतने बढ़ा दिए गए कि देश का किसान गेहूं आवश्यकता से अधिक पैदा करने लगा . यही हाल चावल का हुआ . परन्तु दाल की उत्पादकता ५०० – ७०० किलो / हेक्टेयर तक ही पहुंची . अरहर दाल का समर्थन मूल्य भी २००३-४ में १३ रूपये किलो से बढ़ा कर २०१० मैं ३० रूपये कर दिया . परन्तु इस मैं कम उपज के कारण किसान को फायदा नहीं है .

 

सरकारी समार्थन ने व् विकसित सिंचाई ने देश को चावल का सबसे बड़ा निर्यातक बना दिया

 

परन्तु दाल व् तिलहन के साथ बहुत सौतेला व्यवहार हुआ . उनको अपने हाल पर छोड़ने के बहुत बड़ी कीमत देश ने चुकाई . आज किसान को दाल उगाने से प्रति हेक्टेयर मात्र ८०१४ रूपये की आय होती है जबकि गेहूं उगाने से ३४००० रूपये की ( २००९) . तो कौन किसान भूखों मरने के लिए दाल उगाएगा ? दाल की उत्पादकता पचास सालों मैं नाम मात्र को ४०- ५० प्रतिशत बढ़ी है . इसी समय मैं गेहूं की उत्पादकता पांच गुनी व् आलू की उत्पादकता दस गुनी बड़ी है .

 

परिणामस्वरूप आज भारत १२ मिलियन टन खाने का तेल ( भारतीय उत्पादन ८ मिलियन टन ) ६०००० करोड़ रूपये का खाने का तेल व् $ २.८ बिलियन ( १८००० करोड़ ) की दालें ( ५० लाख टन ) आयात कर रहा है जो देश की आवश्यकताओं का ६० प्रतिशत व् ३०% प्रतिशत है . कुछ वैज्ञानिक दबी जबान से रिसर्च को उचित प्रोत्साहन न देने की बात भी करते हैं . क्या कोई देशी या विदेशी हसतक्षेप है तो हमें नहीं पता. वरना जो देश दूध , गेहूं , चावल मैं क्रांति ला सकता है वह तिलहन व् दालों मैं क्यों फिस्सडी रह गया .

 

दाल में अवश्य कुछ काला है .

 

यदि भारत से नहीं हुआ तो इजराइल की सरकारी प्रतिष्ठानों को इन दो फसलों की कम पानी मैं उत्पादकता बढाने का सरकारी स्तर पर बिना टेंडर के ठेका दे दें . वह खजूर के साथ यह जादू कर चुका है और सात वर्षों मैं वह उन्नत प्रजाति के बीज विकसित कर देगा . वैसे यदि बाबुओं को हटा दिया जाय और वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन के साथ निर्बाध व्यय की राशि दे दी जाय तो भारतीय वैज्ञानिक भी शायद सात साल मैं यह करतब दिखा सकते हैं . दोनों मैं खुली स्पर्धा होने दें . परन्तु बाबु हैं कि मानते ही नहीं . एक वैज्ञानिक पर सौइयों चौकीदार हैं .

 

पर यदि सरकार को जनता की ज़रा भी चिंता है तो झूठ मूठ के आरोपों या दिलासे देने के बजाय इंदिरा गाँधी की तरह सबसे पहले खाद्यान के भण्डारण के लिए बैंक लोन पर रोक पुनः लगाये . यही पिछ्ले सात वर्षों की मंहगाई का वास्तविक कारण है .

 

पर यदि जो बोले वही कुंडी खोले , तो चुप ही रहना अच्छा है !

 

whole sale retail dal priceपर दिल है की दाल बिना मानता ही नहीं !per capita daal consumption

 

How the Wheat Crisis of 2006 Was Created

 

Let us briefly recapitulate our earlier account5 of how the Government managed to hand over the vast stock of foodgrains to private interests. In July 2002 the Food Corporation of India’s (FCI) foodstocks were 63 million tonnes (of which wheat stocks were 41.1 million tonnes) as against a minimum foodgrains buffer stock norm for July 1 of 24.3 million tonnes (14.3 million tonnes for wheat alone).

 

Even if we took the value of these stocks very conservatively at Rs 6/kg, they would be worth Rs 378 billion. Much of this huge capital could have been used as wages in food-for-work schemes to create rural assets – thus increasing the country’s productive base, its storage of farm products, its rural roads, and its education and health infrastructure. However, only a small portion of the total was used in such a fashion. Instead, the Government did the following:

 

(i) Subsidised exports: Between 2000-01 and 2004-05, 29.9 million tonnes of the FCI’s foodgrains stocks was exported at a heavy subsidy. During November 2000 to February 2004, the FCI subsidised wheat and rice exports by Rs 141.35 billion.6 In fact, from 2000-01 to 2003-04, the grains were exported at considerably below the Minimum Support Price paid to the peasants. The beneficiaries were giant foreign agricultural traders such as Cargill and large domestic trading firms who bought the grain for export.

 

(ii) Handed over to traders at a subsidy: Further, a huge quantity of wheat and rice – 18.7 million tonnes – was sold, largely at subsidised prices, to domestic traders under the open market sales scheme (OMSS) between 1999-2000 and 2003-04.

(iii) Plundered with official collusion: Finally, giant quantities appear to have been stolen, in an operation that could only have been organised at the top levels. Between April 2002 and October 2003, 14.7 million tonnes simply disappeared from the FCI’s foodgrain stocks and are unaccounted for.7 If we value these stocks at Rs 6/kg, the loss on this account is Rs 88 billion.

Since the UPA government came into office on the back of massive rural discontent, it has had to revive, to some extent, the rural employment schemes and welfare schemes, which were in a coma during the preceding years. As a result the offtake of foodgrain for these schemes has picked up somewhat, requiring higher foodgrain stocks with FCI.

 

For all these reasons the stocks drew down rapidly, as the result of conscious policy. Wheat stocks as on April 1 (ie before procurement) fell from 26 million tonnes in 2002 to 15.6 million tonnes in 2003 to 6.9 million tonnes in 2004 to 4 million tonnes in 2005. The figure for April 1, 2005, was thus 0.1 million tonnes below the buffer stock norm for that date.

 

Deliberate under-procurement in April-May 2005

Given the increased requirements of the PDS, welfare schemes, and food-for-work schemes, the Government was aware in April 2005 itself that it needed at least around 18.5 million tonnes of wheat for distribution through the following year.

 

Thus it was crystal clear at the start of the procurement that the Government would need to energetically carry out procurement. Nevertheless, it procured only 14.7 million tonnes in the 2005-06 marketing season (April-May 2005).

 

The Government has made out that this merely “happened”, as if by accident. Union Food Secretary, S.K. Tuteja, “hedged questions on why procurement was less this year, saying there is no procurement target and the government is quite happy if private players are paying farmers more than the minimum support price. After all, he said, the objective of the procurement exercise is to ensure farmers get the MSP and the government can meet its welfare commitments.”8

 

Tuteja’s statement is false in two respects: first, the shortfall in procurement was deliberate; and secondly, peasants received less than the MSP. The shortfall occurred for two reasons.

 

The Government tells peasants: “Reduce your grain production”

First, the Government adopted a policy of keeping the Minimum Support Price low in order to reduce food procurement.9 The Economic Survey states that in recent years the Government deliberately restrained increases in the MSPs: “the price policy for rabi and kharif crops announced modest price increases in the past five years. The Government’s policy of restraint in announcing hike in MSP of principal cereals in the last four seasons is likely to address the problems associated with excessive concentration on production of two crops, namely, wheat and rice.” That is, the Government was deliberately getting peasants to shift away from wheat and rice to other crops.

 

This has been the explicit policy of the Government for some time now. In March 2001 then Prime Minister Vajpayee told peasants at a meeting in Haryana to “Look beyond wheat and paddy” and to switch to “horticulture, floriculture, oilseeds and vegetable production and have a good export potential.” With the removal of restrictions on imports under the World Trade Organisation, he said, Indian farmers would have to grow less food and more of other crops. Thus it became official Government policy to discourage foodgrains growth and thus ensure dependence on imports.

 

This policy was also defended by falsely claiming that Indian peasants were growing too much grain, more than Indian consumers could consume. The Food and Agriculture Minister, Sharad Pawar, declared on February 20, 2005, (almost exactly a year before deciding to import wheat) that “the days of importing foodgrains were over.” He boasted: “Punjab, Haryana and parts of U.P. are satisfying the country’s hunger. I want Punjab and Haryana to reduce their production of wheat and rice, which is in abundance.” (emphasis added) He said this on the occasion of announcing a Rs 150 billion National Horticulture Mission, underlining the new direction that the Government wants peasants to take. Most of the little increase in the allocation to agriculture in the 2005-06 and 2006-07 Union Budgets has been devoted to horticulture and micro-irrigation (the latter largely for horticulture).

 

Government freezes Minimum Support Price

As can be seen from Table 4, between 2000-01 and 2005-06, the MSP has increased by just 6.6 per cent. In fact, during 2001-02 to 2004-05 the Wholesale Price Index for all commodities rose 4.7 per cent per year, whereas wholesale prices of wheat rose rose by just 1.1 per cent per year.

 

This virtual freezing of MSPs was intended to dampen wheat production and procurement. Consequently, as can be seen from col. 4, procurement fell sharply between 2000-01 and 2004-05, by 5.84 million tonnes; as a percentage of the crop (col. 5), procurement fell by 9 percentage points.

 

 

 

Table 4: Wheat Minimum Support Price and Procurement

 

 

 

1

 

2

 

3

 

4

 

5

 

6

 

Crop Year Minimum Support Price (Rs/quintal) % change over earlier year Procurement* (million tonnes) % change in procurement over earlier year Procurement as % of crop*

1999-2000 580 5.5 16.35 15.6 21.4

2000-01 610 5.2 20.63 26.2 29.6

2001-02 620 1.6 19.05 -7.7 26.2

2002-03 630 1.6 15.80 -17.1 24.0

2003-04 630 0 16.80 6.3 23.3

2004-05 640 1.6 14.79 -12 20.6

2005-06 650 (700)** 1.6 (9.4)** 9.22 -37.7 13.3

 

*Wheat procurement is carried out in the marketing year following the crop year, that is, procurement of the 1998-99 crop is carried out in 1999-2000.

 

 

** Wheat procurement was started in April 2006 at the price of Rs 650. After this met an abysmally poor response given the low procurement price, the Government declared a bonus of Rs 50, bringing the total to Rs 700. However, by that time many peasants, especially those without holding power, had sold their crop, much of it to private traders.

 

Source: Economic Survey 2005-06 and Commission for Agricultural Costs and Prices (CACP).

 

Government tells FCI: don’t procure

However, the near-freezing of MSPs in wheat was not enough to depress procurement to the extent the Government wished. Therefore, in April 2005, instructions were issued to the FCI not to procure in Uttar Pradesh. U.P. might have been chosen because peasants there have been less organised and militant than those in Punjab and Haryana. We have seen in recent years militant rail rokos and other protests by Punjab peasants specifically on procurement, forcing the Government to procure.

 

None other than the Union Secretary for Agriculture, Radha Singh, confirmed that such instructions were issued by the FCI. She stated that “Procurement [in the 2005-06 marketing season] has declined mainly because government agencies did not make requisite purchases in states like UP.” She said wheat output in U.P. was estimated at nearly 25 million tonnes, making it the largest producer of the crop in the country. Yet the government procurement in the state was a dismal 0.56 million tonnes, as against a normal 2.5 million tonnes. “Nothing stops government-run agencies like FCI from procuring wheat in UP. If procurement in UP would have been in proportion to the output, the stock position would have been much more comfortable.” On the other hand, she noted, “Private players including multinationals are estimated to have purchased around 4-5 million tonnes of wheat in Uttar Pradesh.”10 This demolishes Food Secretary Tuteja’s claim that the shortfall in procurement occurred spontaneously.

 

The Commission for Agricultural Costs and Prices (CACP) called attention to the dangerous consequences of this withdrawal by the state agencies. It noted that corporate groups had been staying out of procurement in Punjab and Haryana because of restrictions on licensing, payment of tax, etc, but

 

 

The removal of restrictions in some other states has seen the entry of corporate groups and large trading companies like ITC and Cargill entering business of the purchase and sale of wheat and wheat flour. In Uttar Pradesh, the corporate bodies have been allowed to directly purchase from farmers at any price above MSP.

 

Meanwhile, the domestic market is poised to witness further changes with possible entry of international agencies. The Australian Wheat Board (AWB) has received Government of India’s permission to set up a wholly owned subsidiary in India. The Board intends to purchase and sell wheat, rice, maize and other permitted agricultural commodities. The AWB also perceives India as a prospective market for Australian wheat in the medium term and is certain that India would start importing wheat in future.

 

Corporate groups enter the market with the profit motive which determine their operations. They purchase such produce for which they foresee a ready market. During a visit to Madhya Pradesh, the members of the Commission observed that ITC purchases at e-chaupal were restricted to Lok-1 variety of wheat. Durum wheat was quoted at prices less than MSP because of poor local demand. At local level, the existence of a corporate purchaser lulled the state government into believing that all wheat would be purchased by private entities. In a scenario, where buying and trading in grain is witnessing the entry of new players, the Commission feels that government, both at central and state levels, have to be vigilant to ensure that farmers get remunerative prices for their produce.11

 

The Commission further remarked on the failure to procure in U.P., resulting in lower prices for the peasant and lower procurement:

 

 

In Uttar Pradesh also, the procurement in the marketing year 2005-06 was around one-fourth of the past three years average procurement. One possible reason for this subdued performance of procurement could be the market reform in the state, enabling corporates to purchase directly from farmers with the incentive of market fee exemption, provided these purchases were made at a price not lower than MSP. However, in several markets of the state, prices ruled below MSP. There were some reports that these corporates did not adhere to their commitment of paying MSP to farmers for their purchase of wheat. In Madhya Pradesh also, there were instances of prices of wheat quoted at less than MSP for certain varieties, which required MSP intervention by the state. However, due to lack of vigil on the part of state agencies, the farmers lost on the price front while the procurement also remained subdued. (emphases added)

 

Thus the evidence is clear: There was a decision to procure less, and to leave the field open for the multinational corporations and other grain speculators, at the expense of both peasants and consumers. It is worth noting that the amount of shortfall in procurement from U.P. – two million tonnes – is roughly the same as the shortfall in the buffer stocks on April 1, 2006.

Filed in: Articles, Economy

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