10:18 am - Sunday October 22, 2017

नवाज शरीफ : बदमाश पाकिस्तानी / आई एस आई / सेना ने उन्नीसवें पाकिस्तानी प्रधान मंत्रि का न्यायलय के हारपून से शिकार किया

nawaz raheel shariefनवाज शरीफ : बदमाश पाकिस्तानी  / आई एस आई / सेना  ने उन्नीसवें पाकिस्तानी प्रधान मंत्रि का न्यायलय के हारपून से शिकार किया

राजीव उपाध्याय RKU

आज तक पाकिस्तान के किसी प्रधान मंत्रि  को अपना पूरा कार्यकाल नहीं करने दिया गया . नवाज शरीफ समय से पूर्व इस्तीफा दिए जाने पर मजबूर किये गए उन्नीसवें प्रधान मंत्रि बने ( कार्य वाहक प्रधान मंत्रियों को छोड  कर ). उनका शिकार पाकिस्तान की बदनाम आई एस आई व् सेना ने किया . सिर्फ इस बार शिकार के लिए पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट को हारपून की तरह इस्तेमाल किया . इसमें कोई संदेह नहीं की नवाज शरीफ के पास विदेशों मैं गैर कानूनी सम्पत्ती थी . इसलिए  सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूर्णतः अनुचित नहीं है .इसमें भी कोई संदेह नहीं की पाकिस्तानी राजनीती मैं भ्रष्टाचार का बोलबाला है और उसे समाप्त करने की आवश्यकता है और इस फैसले से कुछ मदद भी मिलेगी  .परन्तु भर्ष्टाचार तो  पूरे पाकिस्तानी समाज मैं फैला है . पाकिस्तानी सेना भी तो उसकी एक कड़ी है . लन्दन मैं तो महँगा घर जनरल मुशर्रफ का भी  है, जरदारी का भी है . जनरल कयानी ने अपने भाई को लाखों के कॉन्ट्रैक्ट दिलाये और आज ऑस्ट्रेलिया मैं रहते हैं . जहां जनरल अयूब खान ने अमरीकी मदद का मांगला जैसे बड़े बाँध  व् नहरों के बनाने मैं इस्तेमाल किया आई एस आई ने अफगानिस्तान के लिए दी गयी धनराशी का कभी हिसाब नहीं दिया और फौज पूरी राशि डकार गयी . नवाज शरीफ के विरुद्ध जांच मैं आई एस आई या सैन्य संस्थाओं को कैसे जोड़ा जा सकता है जो की इस बार किया गया  ? सच यह है की जांच के सारे पोथे आई एस आई के लिखे हुए हैं सिर्फ जांच का ड्रामा था . पूरे शरीफ खानदान को सत्ता से निकाना था .मुकद्दमे के शुरू मैं ही शरीफ खानदान को गोड फाद र से जोड़ दिया गया था .

पाकिस्तानी न्यायालय मार्शल रूल को बचाने के लिए ‘ Doctrine of Necessity’ ढूंढ लेते हैं , भुट्टो जैसे परम इमानदार  व्  देश भक्त प्रहान मंत्रि को फांसी पर चढ़ा देते हैं  परन्तु संविधान को बार बार रोंद्ती हुयी सेना को कुछ नहीं कह सकते . इस विचित्रता मैं कुल भूषण यादव को सैन्य अदालत महीनों मैं फांसी की सज़ा सुना देती है और मुंबई काण्ड के दोषियों के आवाज़ के सैंपल देने पर पर रोक लग जाती है . नौ  साल बाद भी की अभी तक किसी  दोषी को सज़ा नहीं मिली . ऐसी न्याय व्यवस्था के फैसलों पर किसी को भी क्यों विश्वास होगा . पाकिस्तानी मीडिया भी सेना से डरता है और अंत मैं आज हर टी वी पर नवाज शरीफ को दोषी करार दिया जा रहा है . वैसे भी कभी आई एस आई ने भुट्टो परिवार के विरुद्ध नवाज शरीफ को खड़ा किया था . अब उसी नवाज शरीफ के मोदी जी के शपथ ग्रहण समारोह मैं आने पर उनके विरुद्ध इमानदार व् स्वच्छ छबी वाले इमरान खान को खड़ा कर दिया और अगस्त २०१४ मैं पाकिस्तान मैं धरने शुरू करा दिए . किसी भी प्रधान मंत्रि को सेना अपना पिठ्ठू ही बना रहना देना चाहती है . बेतहाशा धन रक्षा पर खर्च हो रहा है इन सब षड्यंत्रों से पाकिस्तान बर्बाद हो रहा है .जब की मालदीव जैसे देश भी उतने ही स्वंत्र हैं जितना पाकिस्तान !

भारत के लिए पाकिस्तानी सेना का वर्चस्व खतरनाक है . राष्ट्रपति ज़रदारी ने गलती से शुरू मैं ही परमाणु बम पहले ना चलाने की बात कह दी और भारत से दोस्ती बढाने की बात कही सो आई एस आई ने मुंबई काण्ड  करवा दिया . घबराए ज़रदारी  पाँच साल चुप बैठे रहे . लाहोर के बाद कारगिल व् मोदी जी की पकिस्तान यात्रा के तुरंत बाद पठानकोट काण्ड करवा दिए गए . पाकिस्तानी सेना का अस्तित्व भारत के साथ रिश्ते सामान्य होने पर समाप्त हो जाएगा . विश्व मैं किसी देश पर सेना का ऐसा कब्ज़ा नहीं है जैसा पकिस्तान मैं. बाकी संसार को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता पर हमें तो पड़ता है . किसी देश ने परमाणु हथियारों का  हथियारों का नियंत्रण सेना के हाथ मैं नहीं दिया है . पकिस्तान मैं  सेना ने छोटे बमों को सैन्य नियंत्रण सेना मैं रखा है जो विश्व शान्ति के लिए ख़तरा है .

पर प्रजातंत्र की समर्थक पाकिस्तानी जनता भ्रष्टाचार से  दूखी है और वह भी भारत की तरह एक इमानदार सरकार चाहती है .परन्तु सेना प्रजातंत्र को परिपक्व ही नहीं होने देती . राजनीती भी पकने से ही सुधरती है . जब बेईमान सरकारें चुनाव हरतीं हैं तब इमानदारी आती है .

अंततः पाकिस्तानी सेना सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं बल्कि संसार की शांति के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है और उसका कोई उपचार अभी तक नहीं दीख रहा है . संभवतः यदि पाकिस्तान का विघटन भी हो जाय तो आई एस आई एस की तरह यह एक आतंकी संस्था बन जायेगी .इस लिए इसका  वास्तविक चरित्र पाकिस्तानी जनता को उजागर करना ही परम आवश्यक है . नवाज शरीफ को पकिस्तान मैं सम्मनित तरीके से जीने दिया जाय .

It is’nt  full and proper justice

 

Order based on technical grounds

 

The Pakistani Supreme Court judgement that has disqualified Nawaz Sharif is remarkable for several reasons. This is the second time the court has dismissed a sitting Prime Minister. Yusuf Raza Gilani was the first in 2012. However, if you include the Court’s order to arrest his successor Raja Pervez Ashraf–although he survived in office– it’s the third time the country’s Supreme Court has targeted a sitting head of government.

 

Clearly, the Pakistani Supreme Court has established its independence as well as its power in a political system where most authority lies with the army, although the Prime Minister is considered the chief executive. This is a remarkable achievement.

 

However, in this specific instance the judgement of the Pakistani Supreme Court has also raised worrying concerns. They need to be borne in mind before we form a firm opinion about yesterday’s outcome as well as Nawaz Sharif’s future.

 

First, Sharif was unseated because the court deemed him to be in breach of Articles 62 and 63 of the Pakistani constitution. Article 62 requires the PM to be “sadiq” (truthful)  whilst  Article 63 stipulates he should be “ameen” (righteous). As one of the judges on the five judge bench, Ejaz Afzal Khan,  told Reuters, Sharif was no longer “eligible to be an honest member of Parliament.” 

 

The only case the court has is that Sharif did not disclose a salary he never received as chairman of a Dubai-based company called Capital FZE, but  was entitled to, as an asset in his nomination papers in 2013. Sharif argued that an unreceived salary is not an asset. The court disagreed.  But is this small and technical ground sufficient to deem a sitting Prime Minister ab initio   dishonest and unrighteous?

 

The glaring paradox is that the substantial charge against Sharif is one of corruption. As far as that’s concerned, the Supreme Court has referred the matter to the National Accountability Bureau and asked it to file criminal charges. This means  the original charge of corruption has yet to be proved—and, conceivably,  may never be—but the Prime Minister has already been found on technical grounds to be dishonest and unrighteous. This is not just disconcerting, it doesn’t feel like full and proper justice.

 

However, that’s not all. The five judge bench that unseated  Sharif comprised two judges who in april had concluded he should be dismissed on the basis of the  Joint Investigation Team report. For some this was a second big shock. To understand why we need to go back to what happened in april.

 

At that time, when a five judge bench found 3-2 in Sharif’s favour, an implementation bench comprising the 3 judges who supported Sharif was set up to examine and form an opinion on the JIT report. The two judges who had found against him were not part of this bench.

 

Thereafter, from April till now, whenever lawyers debated and dissected the JIT report it was done in front of the three judges comprising the implementation bench. The other two had no role to play. But, suddenly, on thursday night it was announced that a five judge beach would deliver the verdict. At the last moment the other two judges had been brought back into the picture. This seemed to load the dice against Sharif and raised suspicion.

 

Third, the Chief Justice was not part of this five judge bench. No doubt he  chose not to be (because some consider him a Sharif supporter) and,  more over, his participation was not essential, but, equally, his absence is striking and strange. Ordinarily, in such a critical matter one would expect the Chief Justice to preside.

 

In fact, concerns about the procedure by which the court conducted the Sharif case go further. The JIT it appointed included representatives from military intelligence and the ISI. Why? A proper explanation has never been given.

 

Secondly, the JIT was asked to look into a vast volume of financial information, both from within Pakistan and other countries, spanning over three decades, in just eight weeks. At least some people believe this was so difficult a task it could hardly be done properly or fairly.

 

Finally, in the past judges of the Pakistani Supreme Court have bent their views to suit the interest of the country’s military rulers. The most famous instance of this is the validation of martial law on the basis of what’s called the doctrine of necessity. Today there may well be a few who ask if there are hints of this happening again. It may be an unkind question but in the circumstances is it really unreasonable?

 

None of this, of course, exonerates Mr Sharif and his family. It’s even possible he will be found corrupt and, therefore, dishonest and unrighteous. But justice is as much about procedure and fairness as it is about the verdict. Could this be the right judgment but reached in the wrong way?

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One Response to “नवाज शरीफ : बदमाश पाकिस्तानी / आई एस आई / सेना ने उन्नीसवें पाकिस्तानी प्रधान मंत्रि का न्यायलय के हारपून से शिकार किया”

  1. August 1, 2017 at 8:49 am #

    Is Pakistan really a country ?
    Are they really human beings ?
    Do they deserve any such discussion in our country ?

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