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भारतीय हिन्दुओं का विदेशी मुस्लिम आक्रान्ताओं का वीरोचित प्रतिरोध ( ६३६- १२०६ ईपू )

भारतीय हिन्दुओं का मुस्लिम आक्रान्ताओं का वीरोचित प्रतिरोध ( ६३६- १२०६ ईपू ) muslims-invaders1ghauriRKU

हमारे इतिहास के कुछ दबाए गए पहलू – राजीव उपाध्याय

( श्री सीता राम गोयल की पुस्तक से प्रेरित )

अंग्रेजी इतिहासकारों और उसके बाद उनके पिठ्ठू साम्यवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास कुछ इस तरह प्रचलित किया जिसमें हिन्दुओं की लगातार पानीपत के युद्धों मैं पराजय , गजनी का सोम नाथ भंगन ,नादिर शाह व् अब्दाली का कत्लेआम व् बाद मैं अंग्रेजों से पराजय इत्यादि मैं ही पढाई जाती है . इन्हें पढ़ कर अपने इतिहास से इतना क्षोभ हो जता है की हमारी नयी पीढी मैं देश का स्वाभिमान ही नहीं जागृत हो पता है और वह अब पश्चिम के अन्धानुकरण पर चल पडी है .

पैगम्बर हज़रात मुहम्मद की ६३२ ई में मृत्यु के बाद पलेस्टाइन व् सीरिया ६३६-३७ ई में अगले छः महीनों मैं जीत लिए . इसके बाद ससानिदियों का फारस (पर्शिया, ईरान , इराक, खुस्रम) ६३७ से शरू हो कर कुछ वर्षों में हार कर इस्लामिक राष्ट्र बन गए . ६४३ ई मैं इस्लामी खलीफाओं की भारत पर दस्तक शुरू हो गयी थी . ६५० ई तक समरकंद , मंगोलिया के कुछ हिस्से , बुखारा , ताशकंत इत्यादि जीत कर इस्लामी राष्ट्र बना दिए गए .मिस्र की अति पुरानी सभ्यता ६४० – ४१ ई मैं समाप्त कर दी गयी .७०९ ई तक इसलामिक सेनायें उत्तर अफ्रिका पार कर स्पेन पहुँच गयीं .

सिंध मैं अरब पराजायेंmuhammad-bin-qasim-a-failed-terrorist

खलीफा उमर (६३४ – ६४४) के काल मैं युद्ध पोतों द्वारा महाराष्ट्र व् गुजरात पर पहला हमला हुआ जिसे हरा दिया गया .उसके बाद सिंध के देबल पर भी हमला विफल कर दिया गया और अरब सेनापति मुघिरह की मृत्यु हो गयी .चौथे खलीफा ने सन ६६० में जमीन से फिर हमला किया परन्तु सरे अरब आक्रान्ता व् उनके सेनापति मार दिए गए .अगले खलीफा मुवैहा ने छः बार आक्रमण किया पर पांच बार उसे हारा दिया गया . छठी बार उसे मकरान पर कब्ज़े मैं सफलता मिल गयी ( ६६२ ई पू ). इसके अठाईस साल बाद ७०८ ई में देबाल पर पुनः हमला किया गया जिसमें अरबों की पुनः हार हुयी .इस बार इराक के गवर्नर हज्जाज ने बहुत तैयारी के बाद मुहम्मद कासिम को ७१२ ई में पुनः हमले के लिए भेजा .उसने भीषण युद्ध के बाद कुछ देश द्रोहियों की मदद से सिंध व् मुल्तान पर कब्ज़ा कर लिया . पर ७१४ ई मैं उसे वापिस बुला लिया गया और हिन्दुओं ने विद्रोह कर दिया .

इसके बाद अरब सेनायें सिंध ,राजपुताना , उज्जैन से होती हुयी गुजरात तक पहुँच गयी .अंत मैं गुजरात के चालुक्य राजा पलाकेसिं ने उन्हें पराजित कर दिया .सिंध से अरबों ने पंजाब व् कश्मीर पर कूच किया परानु राजा यशोवर्धन व् कश्मीर के राजा ललितादित्य ने उन्हें हरा दिया .दसवीं सदी तक सिर्फ मुल्तान तक अरब साम्राज्य आया था .

काबुल व् जाबुल का युद्ध

काबुल पर हिन्दू शासकों का राज था .६४३ ई से काबुल पर अरब हमले शुरू हो गए थे .सन ६५३ में अब्दुल रहमान ने जाबुल जीत लिया पर हिन्दू राजाओं ने बाद मैं पैसा देना से मना कर दिया .६८३ ई में अरबों ने पुनः हमला किया और वह बुरी तरह से  हार गए .६९३ ई में हिन्दुओं ने काबुल मैं अरबों को हरा दिया .६९५ ई में हज्जाज ने पुनः सेना भेजी जो फिर हार गयी .७४५ – ७५ तक खलीफा कोशिश करते रहे .सन ८७० मैं हिन्दू हार गए और तुर्कों ने उन्हें इस्लाम मैं बदला पर हिन्दुओं ने मिल कर सन ९१५ ई मैं पुनः काबुल पर हमला कर दिया परन्तु बर्फीले तूफ़ान के कारन वह काबुल पर कब्ज़ा नहीं कर पाए . अंत मैं दसवीं सदी हिन्दू राजाओं का काबुल पर शासन समाप्त हो गया . महाराजा रंजीत सिंह ने पुनः काबुल जीत लिया था पर वह हमारा रहा नहीं .

महमूद गजनी : मिथक व् तथ्य sultan-mahmud-ghaznawi1

मुस्लिम इतिहासकारों ने कुछ ऐसी भ्रान्तियां फैलायीं है की महमूद गजनी सत्राह बार भारत आया और मंदिरों इत्यादी को तोड़ता हुआ , हमें रौंदता हुआ निर्विरोध वापिस चला गया .

महमूद गजनी ने पहला आक्रमण सन १००१ मैं किया . राजा जयपाल की सेना तैयार नहीं थी और बहादुरी से लड़ने पर भी उसकी पराजय हो गयी क्योंकि उसके हाथी घोड़ों का मुकाबला नहीं कर पाए .परन्तु गजनी भी पचास हाथी ले कर वापिस लौट गया . राजा जयपाल ने क्षोभ मैं आत्मदाह कर लिया .गजनी ने पुनः हमला किया और जयपाल का पुत्र अनंगपाल पुनः हार गया परन्तु किसी विद्रोह के कारण गजनी पुनः लौट गया . सन १००८ के अगले हमले मैं अनंगपाल के साथ कई राजाओं की सेना की होती हुयी जीत को उसके बिदके हुए हाथियों ने फिर हार मैं बदल दिया . अगले हमले मैं रजा तिर्लोचनपाल व् कश्मीर के सेनाओं ने कई दिन तक युद्ध किया . महमूद ने भीमपाल ( नया नाम निडर भीम ) सामंत बना कर कश्मीर के पास अपना ठिकाना बनाया .परन्तु सन १०१५ के युद्ध मैं गजनी की पराजय हुयी और वह जान बचा कर गजनी जाने में सफल हो गया . अगले दो युद्धों में तिर्लोचंपाल व् भीम पाल की मृत्यु हो गयी व् इनके साथ शाहिया साम्राज्य समाप्त हो गया .

महमूद गजनी को अगली पराजय खजुराहो के चंदेलों से हुयी जिनके साथ एनी हिन्दू राजा भी थे पर वह बिना युद्ध किये सन १०१८ मैं गजनी लौट गया . इसके बाद हिन्दू एकता बिखर गयी .परन्तु फिर भी १०२२ के युद्ध मैं चालीस दिन के युद्ध के बाद भी वह ग्वालियर के किले पर कब्ज़ा नहीं कर पाया और एक दुसरे को भेंट दे कर गजनी वापिस चला आया और पुनः चंद्लों की तरफ नहीं आया .

सोमनाथ का १०२६ का हमले मैं भयंकर युद्ध हुआ था . हालाँकि उसने मंदिर ध्वस्त अवश्य कर दिया था परन्तु हिन्दू राजा पुनः इकठ्ठा हो गए और उसे गजनी लौटने के लिए रास्ता बदलना पडा .परन्तु इसमें भी  उसे अनेकों हमले झेलने पड़े . इसलिए अगली बार उसने हमलावर जाटों के विरुद्ध हमला किया पर सफल नहीं हुआ . महमूद की मृत्यु के बाद हिन्दू राजाओं ने सन ११५३ तक सतलुज तक अपना साम्राज्य पुनः स्थापित कर लिया .

मुहम्मद गौरी

मुहम्मद गौरी के काल से पहले इस्लामिक सेनायें ५४० वर्षों से भारत वर्ष पर विजय का प्रयास करती रहीं पर उसे दारुल इस्लाम बनाने में सफल नहीं हुईं . उस समय मैं भारतवर्ष मैं तीन बड़े साम्राज्य थे , उत्तर मैं चौहान , गुजरात में सोलंकी व् कन्नौज में गहद्वाद . यदि यह इन मिल जाते तो काबुल तक हिन्दू साम्राज्य वापिस ला सकते थे . गौरी ने पहला हमला गुजरात पर किया सोमनाथ दोहराने के लिए किया परन्तु रानी नैकिदेवी की सेनाओं ने आबू के पास उसे बुरी तरह पराजित कर दिया व् वह कठिनाई से गजनी वापिस लौटा .उसके बाद बारह वर्षों तक उसने भारत का रुख नहीं किया .११९८ मैं उसने तराई  के पहले युद्ध मैं पृथ्वी राज चौहान से बुरी तरह से हार  खाई . उस समय की कई किताबों में लिखा है की पृथ्वीराज ने गौरी को सात बार हराया .परन्तु ११९१ के तराई  के युद्ध में उसे जीवित छोड़ कर  पृथ्वीराज चौहान ने बड़ी भारी भूल कर दी जिसका खमियाजा उसे अगले वर्ष के तराई के युद्ध मैं जान दे कर चुकाना पडा .

कन्नौज के राजा जयचंद ने पृथ्वीराज की हार की ख़ुशी मनाई परन्तु इसके बाद वह भी हार गया .

इस प्रकार बंटे हिन्दू राजा फिर एक नहीं हो सके और इस्लामिक राज्य आगे बढ़ता गया . परन्तु हिन्दू प्रतिरोध चलता रहा और असम मैं बख्तियार खिलजी की हार हुयी .lachit-borphukan

इस लेख की अगली कड़ी हम हिन्दुओं को इससे क्या शिक्षा लेनी चाहिए , उसका वर्णन करेंगे .

Filed in: Articles, इतिहास

One Response to “भारतीय हिन्दुओं का विदेशी मुस्लिम आक्रान्ताओं का वीरोचित प्रतिरोध ( ६३६- १२०६ ईपू )”

  1. Ramakant Tiwari
    November 19, 2016 at 10:26 am #

    Tragic had been our history.

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