4:21 am - Tuesday April 25, 2017

राम नवमी : धर्म के आदर्शों का अनुसरण व् प्रसार आवश्यक है कर्मकांडों का पूजन नहीं : अति सर्वत्र वर्ज्यते

राम नवमी : धर्म के आदर्शों का अनुसरण व् प्रसार आवश्यक है कर्मकांडों का नहीं : अति सर्वत्र वर्ज्यतेramdarbaar

RKUराजीव उपाध्याय

देश आज श्रद्धापूर्वक रामनवमी मना रहा है तो एक बार यह सोचना आवश्यक हो जाता है की हम क्यों भगवान् राम को इतने काल बीत जाने के उपरान्त भी याद करते हैं ? निश्चय ही हमें भगवन राम के कृतित्व मैं कुछ प्रेरणास्पद बातें दीखती हैं जिन्हें हम मूल्यवान मानते हैं . पिता दशरथ के वचन की मर्यादा रखने के लिए राज्य छोड़ कर वन मैं चले जाना एक ऐसा उदाहरण है जिस का विश्व मैं कोई सानी नहीं है . इसमें हमारी श्रद्धा इस लिए और बढ़ जाती ई की हमारे ही देश मैं ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं जिन्होंने उसी राज्य के लिए अपने भाइयों की ह्त्या की और पिता को जेल मैं डाल दिया था .

प्रति वर्ष राम नवमी मना के हम भगवान् राम के आदर्शों को पुनः याद कर लेते हैं .

परन्तु विगत दशक की घोर हिन्दू धर्म विरोधी सरकार के हटने के बाद से जो उत्साह देश मैं आया है उसका सही मार्ग दर्शन नहीं होता प्रतीत होता है .

आदर्श धर्म की आत्मा होते हैं . रीति रिवाज़ या कर्मकांड धर्म के स्थूल शरीर के सामान होते हैं .

धर्म के पुनर्स्थापन के लिए उसके आदर्शों को पुनः स्थापित करना समाज का कर्तव्य है और एक ज्वलंत आवश्यकता भी .परन्तु यह बहुत कठिन कार्य है . आज के युग मैं जब भगवान राम के देश मैं माता पिता को बुढापे मैं अपनी ही संतान से संतान से अपना ही घर छुडाने के लिए न्यायालय जाना पड रहा है तो रामनवमी पर हम किसे प्रमुखता दें समाज को राम के आदर्शों पर चलने को या रामनवमी के दिन विशाल भंडारों के आयोजन को ?

परन्तु सही मार्ग दर्शन के अभाव मैं आज भी आदर्शों की तो कोई बात ही नहीं कर रहा . कोई बूढी गाय को बचाने को धर्म मान रहा ही तो कोई रतजगा कराने को . यह सब भी आवश्यक हैं यदि यह आदर्शों की स्थापना के लिए एक माध्यम के रूप मैं किये जाएँ . पर जिस ढंग से यह किया जा रहा है या जिन लोगों द्वारा यह किया जा रहा है उससे आदर्शवादिता की झलक नहीं आती .यह इस लिए दूभर है की आदर्श वही लोग स्थापित कर सकते हैं जो स्वयं आदर्शवादी हों . गांधी जी ने जब सब सुख सुविधा यहाँ तक की वस्त्र भी त्याग दिए तो जनता को उनपर विश्वास हुआ . यह बहुत कठिन कार्य है . ईसा की तरह सलीब पर लटकाना बहुत कठिन है परन्तु चर्च मैं मोमबत्ती जलाना बहुत आसन है . इसलिए मोम्बातियाँ ही जल रही हैं . और धर्मरक्षक मोमबत्तियां नहीं जलाने वालों को ढूंढ ढूंढ कर प्रताड़ित करने को धर्म मान बैठे हैं .

मोमबत्ती न जलाने वालों को ढूँढ कर दण्डित करने के लिए सेना बनाने से पहले हमें जानना चाहिए की हमारे सारे महा पुरुष चाहे वह भगवान राम हों या कृष्ण या बुद्ध या महावीर या नानक या दयानानद या शंकराचार्य सब के सब त्याग की प्रतिमा थे व् आदर्शों के प्रै पूर्णतः समर्पित थे . उनके आदर्शों के प्रति त्याग व् बलिदान ने समाज को नयी दिशा दी थी .

मार्गदर्शन के अभाव मैं देश सदियों से अर्जित ज्ञान व् विवेक को छोड़ , हिन्दुओं को सर्व व्यापी विकास के द्वारा विश्व मैं उपयुक्त स्थान दिलाने को छोड़ जिस मधान्ता व् उन्माद की तरफ जा रहा है वह हिन्दू आदर्शों के अनुपयुक्त है . हम त्याग व् बलिदान के बजाय परिवर्तन के लिए हर चीज का इलाज कानूनों मैं ढूंढ रहे हैं जो ठीक नहीं है . गो रक्षा के लिए गोशाला खोलना उपयुक्त है परन्तु बिना गोशाला बनाये बिना गोवध के लिए मृत्यु दंड की मांग करना अनुपयुक्त है .जिस देश मैं लाखों बच्चे अभी भी बिना इलाज़ के मरते हों उसमें प्राथमिकता उनका स्वास्थ्य व् शिक्षा होने चाहिए .देश के चिंतन मैं सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक है .

इसलिए राम नवमी पर देश को भगवान् राम के प्रदर्शित पथ पर चल सर्वांगीण विकास के द्वारा राम राज्य बनाने के लिए आदर्शवादी मूर्धन्य विद्वानों को आगे आ कर मार्ग दर्शन  करना चाहिये

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