4:48 am - Monday July 13, 2020

भंवरी ,गीतिका व् मधुमिता : खोती हुयी गरिमा व् भौतिकवाद के दुराहे पर आधुनिक भारतीय नारी – राजीव उपाध्याय

south-indian-silk-saree woman

भंवरी ,गीतिका व् मधुमिता : खोती हुयी गरिमा व् भौतिकवाद के दुराहे पर आधुनिक भारतीय नारी

देश दुःखी है क्योंकि जहाँ एक ओर गुडगाँव जैसा बलात्कार कांड होता है वहीँ एक और औरत गीतिका शर्मा तथा उसकी माँ ने आत्मग्लानि में आत्महत्या कर ली. अपने आखिरी लेख में उसने हरियाणा के गृह मंत्री कांडा व एक अन्य औरत अरोरा को जिम्मेवार ठहराया है. मीडिया को मसाला मिल गया . देश कांडा का खून मांगने लगा .किसी मृत्यु पर क्षोभ होना आवश्यक है और जनता का आक्रोश उचित है. कठोर कार्यवाही की मांग, जिससे ऐसी घटनाएँ ना हों , भी उचित है

परन्तु कहीं यह सवाल दब गया कि गीतिका कि मौत के लिए कौन जिम्मेवार है?

जब एक मात्र नवयुवती गीतिका को छः साल में कंपनी का डायरेक्टर बना दिया तो नहीं किसी ने यह कहा कि यह अनुचित है .जब उसने कांडा से घर व मर्सिडीज कार ली तो उसे नहीं पता था कि यह उसकी काबिलियत के लिए नहीं है . जब उसके व कांडा के परिवार छुटियाँ मानाने जाते थे तो उनको नहीं पता था कि यह कृपा क्यों बरस रही है .जब गीतिका का गर्भ पात कराया तो उसे नहीं क्षोभ हुआ अपने जीवन पर . अंत में जब आत्मग्लानी ने जोर मारा तो उसने आत्महत्या कर ली.

तंदूर काण्ड के लिए चर्चित नैना साही ने तो देह कि दूकान लगा रखी थी. लखनऊ की मधुमिता भी अति मह्त्वाकांक्षा का शिकार बनी और अपनी जान गँवा बैठी . राजस्थान की भंवरी देवी तो विडियो बना के ब्‍लैकमेल करने का धंधा करने लगी .

अति आधुनिकता की दौड में नारी अब ना तो अबला बची है ना देवी. जब  पूनम पाण्डेय हर बात पर कपडे उतरने लगती हैं और शर्लिन चोप्डा  गर्व से प्ले बॉय की पहली नग्न भारतीय नारी का गौरव बटोरना चाहती हैं तो कितनी महिला आयोग की अध्यक्ष ने विरोध जताया.. जब बार में रंगीनियाँ कर निकलती हैं तो गौहाटी कांड तो होना ही है. मुंबई की जैन लड़की तो अपने प्रोडूसर से फिल्म में रोले ना देने के सौदे टूटने पर बलात्कार का आरोप लगाती है जैसे एक वैश्या कीमत ना मिलने पर स्वेच्छा से बनाये संबंधों को बलात्कार कह दे जो कोल्कता मैं घटित हो गया ..

देवियों को आज भी देवता मिल जाते हैं .

परन्तु पुनम पाण्डेय और शर्लिन चोपड़ा को ना देवता मिल सकते ना उनके कपड़ों की सुरक्षा समाज की जिम्मेवारी है. हम क्यों इस नए इक तरफ़ा क़ानून बनाने की रेस मैं पद रहे हैं .उधर दहेज़ के कानून के दुरोपयोग से हजारों लड़कों के बेक़सूर माता पिता जेलों मैं पड़े हैं .और हम हैं की इक तरफे कानून बनाये जा रहे हैं.

भारतीय नारी को यह जानना होगा कि उसका पारंपरिक आदर उसके पारंपरिक व्यवहार पर निर्भर है. अगर बराबरी की दौड है तो बराबरी ही मिलेगी . प्रकृति में भोजन व सुरक्षा किसी मादा का जन्म सिद्ध अधिकार नहीं है. यह उसे अपने प्रयासों से पाना होता है. नारी इसका अपवाद नहीं हो सकती . वह बराबरी की दौड़ मैं लेडीज फर्स्ट नहीं मांग सकती . दौड़ तो दौड़ ही होती है.अगर बराबर हैं तो सिद्ध कीजिये.

परन्तु इस चक्कर मैं हमारे परिवार बिखरते जा रहे हैं . जब कोई झुकना नहीं चाहता तो तलक ही बढ़ेंगे . नारियोचित गुण तो अब हम दे नहीं रहे तो नारियां कहाँ से मिलेगी. मिडिया मैं इस्त्रियों की भरमार होने से सब तरफ स्त्री दृष्टिकोण का ही वर्चस्व है. अधिकतर वरिष्ट स्थानों पर परिताक्य्त महिला आ गयीं हैं जो हर समय स्त्रियों को कुमति देती रहती हैं. सीरियल तो मानों औरतों को बिगड़ने के लिए ही बनते हों . शीला दिक्षित  ने लड़कियों को संभ्रांत कपडे पहनने की सलाह दी तो सब हाथ धो कर उनके पीछे पड गयीं . आशा राम बापू हों या किसी कॉलेज के प्रिंसिपल , लड़कियों को मत टोकिये !

अब तो किसी मैं सत्य कहने की हिम्मत भी नहीं है. लखनऊ मैं एक सर्वे मैं सामने आया की १७० लड़कीयों के सब माँ बाप अफसर लड़का खोज रहे थे जब की अफसर लड़के मात्र दस थे . दहेज़ यहाँ से शुरू होता है. और इसी लिए उसका हज़ार कानूनों के बाद उन्मुलन नहीं होता . संतोष तो अब समाप्त हो गया .क्लर्क से क्यों नहीं शादी कर लेते . सहनशीलता तो पिछड़ेपन  की निशानी करार दी गयी है. हर कोई झाँसी की रानी या दुर्गा बनायीं जा रहीं हैं . अपने पति को मारने वाली इंग्लॅण्ड की , किरण अहलुवालिया ही अब नयी आदर्श नारी बन कर उभर रहीं हैं . शादी हो गयी तो अलग रहो , जैसे की ये कभी बूढी नहीं होंगी !

आज भी हर कोई गुणवान शीलवान पारंपरिक बहु चाहता है पर हर कोई तुनक मिजाज़ आधुनिक लड़की बना रहा है.

जब बोये पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से खाय?

आवश्यकता है कि हम अपनी लड़कियों को सही परवरिश कर एक अच्छी लड़की बनायें लड़का नहीं . क्योंकि लड़की लड़का नहीं होती. उसके पारंपरिक गुण ही उसकी वास्तविक पहचान हैं और परिवार मैं आज भी उन्हीं का मोल है..

महिला आयोग व् मंत्रालय को भी सीखना चाहिए कि वह मात्र औरतों कि ट्रेड यूनियन नहीं है . स्वस्थ समाज का निर्माण व् नारी का सही मार्गदर्शन भी उसका कर्तव्य है. अभी तो वह अभिवावक कम और वोट बैंक के बिगडेल नेता जैसा व्यवहार ज्यादा कर रहा है.

सबसे ज़रूरी है कि हम सच बोलने कि ताकत रखे मात्र बहाव में बहना जिंदगी नहीं है.

Filed in: Articles, Uncategorized

No comments yet.

Leave a Reply