2:49 am - Wednesday July 17, 2019

Friends Not Masters : भारत को कृषि , रक्षा व् अन्य राष्ट्रहितों की रक्षा में नित नयी अमरीकी धमकियों का सामना करना पडेगा

 

Friends Not Masters : भारत को कृषि , रक्षा व् अन्य राष्ट्रहितों  की रक्षा में नित नयी अमरीकी धमकियों का सामना करना पडेगा

राजीव उपाध्याय rp_RKU-263x300.jpg

पाकिस्तान के भूतपूर्व राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने अपनी पुस्तक का शीर्षक मानों आज के भारत के लिए ‘ Friends Not Masters ‘ रखा था . उन्हें अमरीकियों से मित्रता बढाने का बहुत अनुभव था जिसका सारांश उन्होंने अपने एक वाक्य के शीर्षक मैं कर दिया . भारत ने भी जब अमरीका से दोस्ती बढाने की सोची  थी तब भी जसवंत सिंह व् टैलबोट की लम्बी बातचीत में भारत ने स्पष्ट कर दिया था की भारत अपने हितों की रक्षा के लिए स्वतंत्र होगा . भारत की रूस व् ईरान से पुरानी  दोस्ती है और वह उसे नहीं तोड़ेगा . अमरीका भी मान गया था की फ्रांस के भूत पूर्व राष्ट्रपति डी गॉल की तरह भारत व् अमरीका मित्र होते हुए भी स्वतंत्र विदेश नीति  अपनाएंगे जिसमें दोनों को बहुत लाभ होगा परन्तु इंग्लैंड की तरह भारत अमरीका की हर बात मैं हाँ नहीं करेगा . अमरीका का कोई मित्र नहीं है . वह जब आवश्यकता होती है तो सबका उपयोग करता है और बाद में रद्दी मैं डाल देता है . रूस के गोर्बाचोव , मिस्र के हुसेनी मुबारक , ईरान के शाह , सद्दाम , गद्दाफी , मुशर्रफ सब के सब अमरीका के कभी मित्र थे .

भारत व अमरीका को आज एक दुसरे की आवश्यकता है . यदि चीन जापान की तरह मात्र आर्थिक शक्ति बन कर खुश हो जाता तो अमरीका को कोई शिकवा नहीं था . चीन ने रूस के बाद नयी वैश्विक महाशक्ति बनने का जो फैसला किया और साउथ  चाइना समुद्र  को हथियाने की कोशिश की उससे सब की ऑंखें खुल गयी . तब से अमरीका उसे विश्व शक्ति बनने से रोकने मैं जुट गया . चीन भारत को १९६२ का भारत समझ रहा था . आज तो वह १९६२ के मुकाबले कहीं ज्यादा ताकतवर है . वह भारत को रोंदना चाह रहा था .यह भी सच है की डोकलाम में चीनी तेवर ढीले पड़ने का एक मुख्य कारण जापान व् अमरीका का भारत का साथ देने की स्पष्ट नीति थी . रूस अपनी आर्थिक आश्रितता के चलते डोकलाम में १९६२ की तरह स्पष्ट रूप  भारत की तरफ  नहीं आया था . कपटी चीन पर कभी भी विश्वास नहीं किया जा सकता .राष्ट्रपति ट्रम्प ने पाकिस्तान द्वारा अभिनन्दन को तुरंत रिहा करवाने मैं भी बहुत मदद की थी .

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प एक वैश्विक अजूबा हें . उन्हें अंतर्राष्ट्रीय नियमों , संधियों व् गरिमा पूर्ण आचरण से कोई लगाव नहीं है .वह सिर्फ अपने आने वाले चुनाव को जीतने के लिए दृढ संकल्प हें . वह हर संधि को तोड़ रहे हें . सीरिया व् ईरान ने कोई गलती नहीं की पर फिर भी उन  पर चढ़े हुए हैं .रूस को अमरीका ने चीन की बाहों में फैक दिया है . यूरोप की भी उन्हें कोई परवाह नहीं है . चीन पर एक तरफ़ा आर्थिक प्रत्बंध लगा दिए हैं . उनका यह कहना की इन संधियों में अमरीकी हितों का ख्याल नहीं रखा गया कुछ हद तक ठीक है परन्तु अमरीका विश्व से तेल का डॉलर मैं व्यापार करा कर  बहुत फायदा भी उठा रहा है . इसलिए गरीब देशों को कुछ मदद देकर अपना नेत्रित्व सुदृढ़ करना भी अमरीका के लिए कोई नुक्सान का सौदा नहीं था . राष्ट्रपति ट्रम्प डॉलर के वर्चस्व को समाप्त करवा देंगे .

मदमस्त हाथी की तरह अमरीका ने भारत को पहले वेंज़ुला से सस्ता तल खरीदने से रोका फिर ईरान से तेल खरीदने से रोका . अब रूस से एस – ४०० मिसाइल रक्षा प्रणाली के डील समाप्त करवाना चाह रहा है .भारतीय आई टी कंपनियों पर नकेल कस दी . भारत की हथकरघा व् कुछ अन्य उत्पादों जिन पर ड्यूटी नहीं लगती थी उनपर ड्यूटी लगा दी . आये दिन वह H1-B visa पर रोक लगाने की धमकी  देता रहता है . परन्तु सबसे खतरनाक उसका भारतीय कृषि उत्पादों को आयात के लिए खोलने की माँग है . यह भारत के लिए आत्म ह्त्या होगी . इसी तरह पर्यावरण को समृद्ध देशों ने बिगाड़ा है . भारत की जबरदस्त वकालत से समृद्ध देश भारत व् विकासशील देशों से भारत को जो आर्थिक मदद मिलनी थी उसे भी रोकना चाहता है . ट्रम्प को भारत से कोई वैमनस्य नहीं है . वह तो हर किसी को अमरीकी गुलाम मानता है और राजा की तरह इकतरफा हुक्म देता रहता है . मुश्किल यह है ईरान भारत से कुछ सहायता की उम्मीद लगाये बैठा था . ऐसे ही बहुत छोटे देश भारत व् चीन से उम्मीद लगाए बैठे थे . परन्तु रूस को छोड़ कोई अमरीका का मुकाबला नहीं कर पा रहा .परन्तु अमरीका की इस इक तरफ़ा कार्यवाही से अब बहुत राष्ट्र  इकठ्ठा होने की कोशिश कर रहे हैं .  जिस दिन यह कोशिश सफल हो गयी उस दिन अमरीका बहुत पछतायेगा .

भारत एक मित्र राष्ट्र की तरह अमरीका का सार्वजानिक विरोध नहीं कर रहा है . परन्तु पीठ के पीछे धीरे धीरे अपनी बात ट्रम्प तक  पहुंचाता रहता है . भारत भी इसी आशा मैं है की शायद आगामी  चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति ट्रम्प सुधर जायेंगे . पर इसके आसार नहीं दीख रहे हैं . परन्तु किसी हालत मैं भी भारत व् अन्य गरीब देश अपनी कृषि व् खाने की सामग्री  को को अन्तराष्ट्रीय मंडियों मैं नहीं डाल सकते . पहले से कर्जों तले  दबे छोटे किसानों से भरे भारत के लिए तो यह तो आत्महत्या होगी . हालाँकि भारत की बहुत कम उत्पादकता को ठीक करना भी आवश्यक है .इसी तरह न भारत न ही चीन यह मान सकते हैं की वह पयावरण बिगाड़ रहे हैं. यह बढ़ती हुई गर्मी तो समृद्ध देशों की देन  है . गरीब देश इसका खमियाजा क्यों भुगतें . परन्तु भारत को सब विकास शील देशों को अभी से चौकन्ना करना होगा नहीं तो अकेला कोई अमरीका को नहीं रोक सकेगा . अमरीका जो यदा कदा  H1-B  रोकने की धमकी देता रहता है उसके उपचार के लिए लिए इसका चीन की तरह फेसबुक , गूगल व् माइक्रोसॉफ्ट व् वीसा व् मास्टर कार्ड का भारतीय रूपांतर तैयार करना है . अमरीकी धींगामुश्ती वाली धमकी को बदले की धमकी जता कर ही रोका जा सकता है .

यदि ओबामा की तरह ट्रम्प एक सामान्य अमरिकी राष्ट्रपति की तरह व्यवहार करते तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में अमरीका का अधिक मान होता . परन्तु भारत को अपने हितों की  रक्षा करते हुए अमरीका को अपनी तरफ रखना है . यह हमारी विदेश नीति के लिए बड़ी चुनौती है .

पर अमरीका को राष्ट्रपति अयूब खान की पुस्तक के शीर्षक ‘ Friends Not Maters ‘ का महत्व समझाना आवश्यक है .

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