1:43 pm - Saturday November 28, 2020

आत्मनिर्भरता के किये नयी रक्षा नीति : नोटबंदी व् मेक इन इंडिया की तरह ईमानदारी व् नेक इरादों के बावजूद साहसहीनता व्अव्यवहारिकता के चलते क्यों असफल होगी ?

आत्मनिर्भरता के किये नयी रक्षा नीति : नोटबंदी व् मेक इन इंडिया की तरह  ईमानदारी व् नेक इरादों के बावजूद साहसहीनता व् अव्यवहारिकता के चलते क्यों असफल होगी ?

राजीव उपाध्याय rp_RKU-263x300.jpg

यह भारत का दुर्भाग्य है की पिछले छः वर्षों से ईमानदारी व् नेकनीयती से भरपूर सरकार की हर बड़ी आर्थिक नीति असफल हो गयी जिसमें नोट बंदी  , जीएसटी व् मेक इन इंडिया प्रमुख थीं . मात्र असफल ही नहीं नोट बंदी तो देश के विकास को अगले दस साल बेहद पीछे धकेल गयी .इसी तरह् मेक इन  इंडिया की नीतियाँ इतनी अव्यवहारिक थी की पांच साल के प्रयासों के बावजूद कुछ न दे सकीं और चीन के हमले के समय , हम मुंबई व संसद पर  पर हमले की तरह , सारे विश्व मैं दौड़ दौड़ कर हथियार इकट्ठे करते रहे . इसका मुख्य कारण अनुभव हीन नीति निर्माताओं वाले बाबुओं का वास्तिविकता न जानना व् आवश्यक साहस की कमी होता है . जैसे नए नोट का साइज़ ऐ टी एम् मैं न आना जिससे सारे ऐ टी एम् बेकार हो गए और लोग लम्बी लाइनों मैं खड़े होने को महीनों मजबूर हो गए .

रक्षा मैं आत्म निर्भरता की अव्यवहारिक नयी नीति  नोट बंदी की ही तरह शायद असफल ही नहीं देश की सुरक्षा के लिए भविष्य मैं घातक भी  हो सकती है .

ईमानदारी व् नेक नीयति के चलते नयी नीति मैं कोई मंशा का दोष नहीं है . १०१ आइटम का आयात बंद कर उनको देश मैं बनाए जाने का निश्चय भी प्रथम दृष्टि मैं उचित  ही प्रतीत होता है क्योंकि इन की तकनीक अब भारत मैं मिल सकती है .इसी तरह बजट मैं स्वदेशी उत्पाद के लिए अलग प्रावधान भी ठीक लगता है क्योंकि हवाई जहाज या पनडुब्बी जैसे मंहगे आयात के बाद घरेलु उत्पाद के खरीदने के लिए पैसा ही नहीं बचता था . अलग बजट से कुछ स्वदेशी आर्डर भी दिए जा सकेंगे . पचास हज़ार करोड़ रूपये का प्रावधान भी ठीक ही है . तो समस्या कहाँ है ?

नयी रक्षा नीति गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ के लिए सिर्फ दर्द कम करने की दवा है जो कोई इलाज़ नहीं है . गलत इलाज़ से दर्द के कम होने को दवा की सफलता मानने से अंत में बीमार की मृत्य भी हो सकती है .

पहले पैसों को ही लें . देश मैं अनेकों उच्च कोटि के आवश्यक हथियार बन कर तैयार हैं . इनमें तेजस  MK 1, एल सी एच हेलिकोपटर , अर्जुन टैंक MK 2,  धनुष , टाटा व् भारत फोर्ज की तोप , अग्नि , नाग , प्रहार , निशांत मिसाइल , बी ई एल के आधुनिक रडार , टाटा की आर्मोरेड व्हीकल , रूसी ए  के २०३ राइफल , इत्यादि अनेकों आवश्यक शस्त्र हैं जो कम बजट के चलते नहीं खरीदे  जा रहे हैं . जो सफल हथियार बन चुके हैं उनके आर्डर के लिए ही एक लाख करोड़ रूपये से ज्यादा की आवश्यकता है . इसके अलावा ११४ नए हवाई जहाज़ों , रूसी कामोव हेलीकाप्टर , नयी आधुनिक पंडूब्बी , नेवी के माईन  स्वीपर , नए आधुनिक मिसाइल , लेज़र बम ,चीनी  जे २० हवाई जहाज  को पकड़ने वाले राडार  के लिए पैसे चाहिए . इसके अलावा नयी तरह के हमले जैसे अन्तरिक्ष , साईबर , satelite, कम्युनिकेशन जम्मिंग शामिल हैं जिनके विरुद्ध रक्षा आवश्यक है . इनके अतिरिक्त चीन हाइपर सोनिक मिसाइल, लेज़र गन  जैसी अनेकों नयी टेक्नोलॉजी विकसित कर रहा है जो बहुत जल्दी हमारे लिए घातक हो जायेंगी .पाकिस्तान व् चीन को चिकनी चिपुडी बातों से नहीं समझाया जा सकता . पर  भारत ने गत दस वर्षों मैं रक्षा को इतना कम बजट दिया है की देश अब अपनी रक्षा करने मैं असमर्थ हो गया है . इसी लिए कभी पाकिस्तान तो कभी चीन कोई न कोई हमला करता रहता है . चीन हमारी ज़मीन भी हड़प रहा है और  हम पर आसानी से दबाब बना लेता है. हम असहाय बने रहते हें .

इसलिए हज़ारों सालों की गुलामी से पीड़ित यह देश रक्षा की आवश्यकताओं को और अधिक नहीं टाल सकता . देश को बजट के अलाआ एक मुश्त अतिरिक्त दो लाख करोड़ रूपये रक्षा सामग्री को खरीदने के लिए खर्चने होंगे .

दूसरी मुख्य गलती नोट के गलत साइज़ जैसी अव्यावहारिकता है . भारत के पास रक्षा उत्पादन के लिए मैं पूर्णतः विकसित पब्लिक सेक्टर है . पर अनेको प्रतिबंधों से उसके हाथ पैर बाँध कर लड़ने को कहा जाता है . इंदिरा गांधी जी व् अब्दुल कलाम  की तरह यदि बीस हज़ार करोड़ रूपये का दस वर्षों तक अक्षुण्य  बजट देकर पूर्ण स्वतंत्रता दे दें और ऑडिट या सीबीआई के व्यर्थ के प्रकोप से सुरक्षा दे दें  तो वह नया जेट  इंजिन बना लेगा . एच ए एल , बी ई एल इत्यादि को को एयर इंडिया की तरह ऑर्डर्स के लिए सता सता कर बंद करना देश द्रोह होगा . प्राइवेट सेक्टर के पास कोई जादू की छड़ी नहीं होती है . वहां निर्णय शीघ्रता से लिए जा सकते हैं और विदेशों से तकनीकी अनुबंध तुरंत किये जा सकते हैं .परन्तु उसे पैसा लगाने के लिए लम्बे समय तक आर्डर व् लाभ के लिए आश्वस्त करना होता है . सरकार की रक्षा नीति मैं कोई स्थायित्व नहीं होता और लालच सर्व व्यापी होता है . कांग्रेस का निर्णय बीजेपी ने बदल दिया . अगली सरकार  क्या  करेगी , कितने हवाई जहाज खरीदेगी पता नहीं ! इसलिए बिरला व् अम्बानी जैसे चतुर व्यापारी रक्षा क्षेत्र मैं कभी नहीं घुसते . कुछ देश भक्ति से पीड़ित टाटा , महिन्द्रा , कल्याणी व् एल&टी  जैसे लोग घुस कर हाथ जलाए आर्डर की अनंत प्रतीक्षा मैं बैठे हैं . इस सरकार को इमानदारी के भूत ने वैसे ही जकड रखा है जैसे वीपी सिंह के जमाने मैं था . इसलिए कीचढ़ के छीटों के डरसे  इसकी समय पर शीघ्र उचित निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो चुकी है . वर्तमान नीति, मेक इन इंडिया की ही तरह अव्यवहारिक है . सरकार को टाटा महिन्द्रा जैसी बड़ी कंपनियों को नए आवश्यक हथियारों का  एक बड़ा डेवलपमेंट आर्डर देकर शरुआत करनी होगी . साथ मैं सफल होने पर कम से कम एक और बड़ा आर्डर पैसा वसूली के लिए देना होगा . उसके बाद और लोग उसके उत्पादन मैं आ सकते हैं .नए उद्यमियों को प्रोत्साहन की स्थायी व्यवस्था आवश्यक है . हर नए हथियार को टेंडर से खरीद कर रक्षा क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता .रेलवे को  वर्षों से इस प्रक्रिया के उपयोग का अनुभव है .देश मैं उत्पादन मैं आत्मनिर्भरता मैं सबसे अधिक सफल संस्था भारतीय रेल है जिसके अनुभवों का लाभ उठाया जा सकता है . परन्तु प्राइवेट सेक्टर तभी लाया जा सकता है यदि सरकार लम्बे समय के लिए रक्षा बजट मैं वृद्धि कर सके . अन्यथा इस सपने को छोड़ना ही उचित होगा .

दूसरी अव्यावहारिकता आयात पर पूर्ण रोक लगाना होगी . संसार मैं इतनी नयी रक्षा तकनीक विकसित हो रही हैं की भारत को हर पाँच  साल मैं कुछ हथियार आधुनिकतम तकनीक के खरीदने होंगे . इसलिए हर क्षेत्र मैं तीस प्रतिशत आयात को खोलना होगा अन्यथा सेना प्रमुखों को लड़ाई की तैय्यारी के बजाय बाबुओं के चक्कर मैं सारा समय नष्ट करना पड़ जाएगा .

इसके अलावा हमारी चौदह साल मैं हवाई जहाज खरीद पाने वाली प्रणाली मैं परिवर्तन की आवश्यकता है .मेट्रो रेल बनाने में श्रीधरन ने जो क्रांति लाई उसकी रक्षा क्षेत्र मैं बहुत आवश्यकता है . परन्तु हर बड़े रक्षा सौदे मैं कमीशन खोरी की वास्तविकता  व् बदनामी के कारण कोई इसके सरली करण  का साहस नहीं कर रहा . अन्यथा क्यों किसी बड़े सौदे मैं १४६ बार विभिन्न अनुमति लिया जाना आवश्यक है ?. वित्त मंत्रालय का बजट के बाद कोई दखल नहीं होना चाहिए . रक्षा मंत्रि के अनुमोदन के बाद एक महीने मैं करार हो जाना चाहिए . दूसरा बोफोर के लिए फूस रूसी गोलों की खरीद से अभी भी सीखा नहीं गया है . रक्षा सामग्री  मैं कीमत के ऊपर गुणवत्ता को प्राथमिकता देना आवश्यक है . हथियारों की खरीद मैं सेना प्रमुखों का आवश्यकता निर्धारण मैं अंतिम फैसला होना चाहिए अन्यथा बाबुशाही  मैं बालाकोट मैं सेफ लिंक के बिना अभिनन्दंन  के पकडे जाने जैसी सी घटनाएँ होती  रहेंगी .

इसी तरह युद्ध जीतने की क्षमता के बाद विदेश नीति सफल हो सकती है . विदेश नीति युद्ध जीतने की क्षमता का पर्याय नहीं बन सकती .

मुश्किल यह है की हम चीन से लेकर कारगिल व्  बालाकोट तक की लड़ाइयों के कडवे अनुभवों को दो साल मैं भुला देते हैं  और पुरानी  शराब को नयी बोतल मैं देने का प्रयास करते रहते हैं  जैसा की निम्न लिखित लेख से प्रतीत होता है .

Defence Procurement, DPP, Covid, Covid19, Pandemic, DPP 2020, Make in India, LCA,
Source: Wiki

The Ministry of Defence (MoD) recently released the draft Defence Procurement Procedure (DPP) 2020. The new draft DPP amends existing military procurement rules in line with Governments’ long-running targets to boost indigenous defence capability and reduce reliance on imports under its “Make in India” initiative. The draft document like its previous iteration in the DPP 2016 continues to carry along a few below par policies and notions that may hinder India’s attempts at indigenisation vis-à-vis direct procurement which is generally cheaper and more efficient.

The draft DPP 2020 proposes higher levels of local content, new multipliers in defence offsets, a procurement category for leasing, and new options for equipment sustainment activity. It attempts to better the 2016 iteration of the draft. The intent of the new DPP is to further promote indigenous design capacity and higher localisation, both of which, if implemented effectively, could potentially increase the role of domestic industry, especially the private sector, in defence production.

The most preferred category to process defence procurement, called Buy ‘Indian Indigenously Designed Developed and Manufactured’ or (Indian-IDDM), towers over and above all other categories in preference. Under Indian-IDDM, it is proposed any order will require at least 50 percent indigenous content if the design is indigenous in addition to development and manufacture, an increase from 40 percent. Or under Buy-Indian category with an indigenous design and manufacture, the required percentage of indigenous content will be 50 percent or 60 percent if product has not been designed and developed indigenously.

No. Category Proposed Indigenous Content DPP 2016
1 Buy(Indian-IDDM) Indigenous design and ≥ 50% Min 40%
2 Buy (Indian) In case of indigenous design ≥ 50% otherwise ≥ 60% Min 40%
3 Buy and Make (Indian) ≥ 50% of the ‘Make’ portion Min 50% of Make
4 Buy and Make ≥ 50%
5 Buy (Global – Manufacture in India) ≥ 50%
6 Buy (Global) Foreign Vendor – Nil Indian Vendor ≥ 30%

(Draft DPP 2020)

This crucial industry policy document while favouring “Make in India” does not make provisions to analyse or compare the cost premium and consequent potential decrease in output delivered in implementing such high levels of indigenous content in platforms. Indigenisation is about reducing dependency and increasing India’s capability to meet its own security needs. However, India lacks several core sub-systems manufacturing capability, production expertise, resulting in many of the systems being developed and produced for the first time in India. The MoD continues to falter in this aspect in its myopic pursuit of indigenisation.

Consequently, the history of indigenous development in India is replete with examples of mismanagement, time delays, late stage design modifications and cost escalations. The Light Combat Aircraft produced by Hindustan Aeronautics; the Arjun Main Battle Tank; Air Independent Propulsion (AIP) systems for the Indian Navy’s Scorpene submarines; and the acquisition of a weapons locating radar for the Army before Kargil, form part of a long list pointing to the risks associated with the development sub-systems and platforms afresh.

For example, Japan, which is currently assembling 42 F-35 stealth fighters domestically through Mitsubishi Heavy Industries, is in the midst of a debate of discontinuing production versus the import of finished aircraft from the U.S. to reduce cost and maximise the number of platforms. Similarly, the UK decided to purchase a new Apache fleet ‘off the shelf’ from Boeing instead of paying extra to have them remanufactured to UK-specific standards under licence by AgustaWestland (now part of Leonardo) resulting in cheaper per unit cost.

Provision for ‘Leasing’

Leasing has been introduced in the draft DPP 2020 as another category of acquisition in addition to the existing ‘Buy’ and ‘Make’ acquisition templates for the first time. Under this option, equipment or platforms may be leased from defence firms or countries rather than purchased for ownership by the armed forces. Firms would enter into longterm/medium term contracts offering to provide a guaranteed number of operationally available frontline equipment on a daily basis (e.g. combat aircraft or tanks) with the contractor responsible for maintenance and repair for the duration of the contract. The draft says:

“Leasing provides means to possess and operate the asset without owning the asset and is useful to substitute huge initial capital outlays with periodical rental payments. Leasing would be permitted in two sub categories i.e. Lease (Indian), where Lessor is an Indian entity and is the owner of the asset, and Lease (Global).”

Risk assessment would be a major challenge when writing such contracts, with the need to allow for use, destruction and replacement in both peace and conflict. Also, such options would need a through evaluation of the benefits and costs of leasing versus an outright purchase, where the purchase option requires the armed forces to assume the responsibility for maintenance, repair and replacement of equipment.

Strategic Partnerships

The draft continues to carry the controversial “Chapter-7” sans any edits or changes from the previous iteration in 2016. This key chapter outlines the rules governing Strategic Partnerships in the manufacture of four programs — fighter aircraft, helicopters, armoured vehicles and submarines — to be done in collaboration with a domestic partner company in India. The rules in this chapter continue to restrict foreign manufacturer’s stakes to 49 percent in any such partnership, creating a plethora of issues around the willingness of these companies to share the latest technologies to IPR issues. The rules place the burden of performance guarantees in terms of quality and timely deliveries on the foreign manufacturer owning a 49 percent stake while mandating the Indian partner to be the prime contractor and bidder.

Amidst much criticism it is important to point out that the fact, that the Ministry of Defence has made information available to the public in order to solicit opinion leaves much hope that some course corrections is eminently possible. Offsets are going to be the short-term trigger to create a sustainable eco-system for defence production and will be key to helping shape the development of the Indian defence industry.

The draft DPP 2020 like its previous iteration has left out issues of improvements in procedures, institutional structures and issues related to accountability. How effective will the new DPP be without these amendments? It will eventually be contingent on how the Ministry of Defence, Service Headquarters, Integrated Defence Staff now headed by the CDS and the DRDO which constitute the labyrinthine procurement set up implement these.

Identifying key strategic capabilities or platforms and promoting the development of core competencies maybe a more conservative and risk averse approach in pursuing indigenous defence capabilities. Balancing costs and risk between equipping the armed forces with the items they most desire and sustaining a national industrial capability is important given the fiscal climate. India can’t afford to have small batches of indigenous capability of everything, achieving economies of scale in production is key to offsetting development costs.

Though to conclude, the fundamental issue remains the quantum of funds allocated for capital expenditure or modernisation, more so with the COVID19 pandemic’s impact on the economy. In the near term, acquisition programmes including committed liabilities face being disrupted and delayed. The Ministry of Finance has already issued directives to restrict expenses for the first quarter to either 20 or 15 percent of the year’s budget estimates to battle the fallout of COVID19 on its revenues. The MoD needs to anticipate and plan the prioritisation of spending and hard choices regarding cuts in line with the looming fiscal reality. Deliberating the comparative costs associated with such a single-minded pursuit of indigenisation as laid out in the 2020 draft defence production procedure maybe a prudent exercise too.

 

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