राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का डी एन ए प्रेम : राजनीती से सामीप्य आदर्श समाप्ति की प्रथम सोपान है

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का डी एन ए प्रेम : राजनीती से सामीप्य आदर्श समाप्ति  की प्रथम सोपान है

राजीव उपाध्याय

दिनांक ५ जुलाई को गाज़ियाबाद  में  को एक पुस्तक  के विमोचन पर  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर्चालक श्री मोहन भगवत ने कहा कि मुसलमानों समेत भारत के सब लोगों का डी एन  ए एक है .यह तो एक सर्व विदित सत्य  है कि इस पुरातन देश के हज़ारों वर्षों के इतिहास मैं इस्लाम तो मात्र एक हज़ार वर्ष पुराना है . इस लिए उसके पहले तो सब हिन्दू ही थे और उनका डी  एन ए भी एक ही होगा . जो थोडा बहुत अंतर है वह उत्तर व् दक्षिण भारत व् संथाल इत्यादि जन जातियों का ही है  . उसमें भी यह सिद्ध हो गया है की पूरे भारत का डी  एन ए एक है और आर्यों के बाहर से आने की थ्योरी गलत है .पर श्री भागवत ने यह हिन्दू मुस्लिम मतभेदों के संदर्भ मैं की थी . इसके पहले उन्होंने कहा था कि जो हिन्दू यह कहता है की मुसलामानों को देश मैं रहने का अधिकार नहीं है वह हिन्दू नहीं है . यह व्यक्तव्य भी राजनितिक रूप से बिलकुल ठीक ही है क्योंकि देश मैं सब नागरिकों को रहने का अधिकार है .

पर इसे कौन नकार  रहा था जिसके कारण भागवत जी को यह व्यक्तव्य देना पडा ?

१९४७ के भीषण दंगों के और पाकिस्तान के इस्लामिक राष्ट्र बनने पर भी  भी बहुमत से भारत के हिन्दुओं  ने भारतीय  संविधान मैं धर्म निरपेक्ष  राज्य स्थापित किया जिसमें हर नागरिक को सामान अधिकार थे . तो सरसंघ चालक को यह क्यों दुबारा कहना पडा ? वास्तव मैं हिन्दू मुस्लिम एकता या सहयोग राष्ट्र की प्रगति  व शांति के लिए एक नितांत राजनितिक आवश्यकता है . पर यह सरकार का दायित्व  है संघ का नहीं . हिन्दू मुस्लिम संस्कृति एक नहीं है .दोनों संस्कृतियाँ अलग धर्मों  पर आधारित हैं . राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना केवल हिन्दू संस्कृति के प्रसार व् हिन्दुओं की रक्षा के लिए हुयी थी.

राष्ट्रीय स्वयं  सेवक संघ की स्थापना श्री  हेग्देवर जी द्वारा  १९२५ मैं हुई थी और इसका प्रथम  उद्देश्य हिन्दुओं को एकत्रित  कर उनकी रक्षा करना था .यह इस लिए आवश्यक हो गया था की सन १९०६  मैं मुस्लिम लीग की स्थापना हुई थी . जिसका उद्देश्य मुसलामानों को इकट्ठा कर उनकी राजनीतिक शक्ति को बढ़ाना था और अंततः अलग मुस्लिम राष्ट्र की स्थापना करवाना था  . हिन्दू  हितों की  रक्षा के लिए एक समानांतर संगठन की आवश्यकता थी . इसके अलावा सदियों की गुलामी से लुप्त  होती हुई हिन्दू  संस्कृति  के पुनरुत्थान व प्रचार  प्रसार के लिए एक व्यापक जन शक्ति व चेतना को  तैयार करना था .

डा हेगडेवार ने कभी भी संघ के स्वयं सेवकों को  राजनीती मैं भाग नहीं लेने दिया . यहाँ तक की यद्यपि व्यक्तिगत रूप से हेग्देवर जी ने १९३०  के गाँधी जी के सत्याग्रह  में भाग लिया पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को इससे दूर रखा . इसकी पराकाष्ठा   थी संघ का १९४२ के भारत छोडो आन्दोलन से न जुड़ना . अंत में कांग्रेस ने १९३४ में अपने सदस्यों को हिन्दू महासभा व् राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ने से रोक दिया . इसको समझना आवश्यक है कि क्यों  प्रखर राष्ट्रवादी डा हेग्देवर को यह अप्रत्याशित कदम लेना पड़ा.

हिन्दू मुस्लिम एकता अंग्रेजी शासन से लड़ने के लिए काँग्रेस के लिये राजनितिक रूप से अति आवश्यक थी . इसलिए गांधीजी ने १९२०  मैं तुर्की के खलीफा को बचाने के लिए  खिलाफत आन्दोलन  का समर्थन भी किया जिसका  जिन्नाह तक ने विरोध किया था. पर यह एकता अस्थायी थी . १९२२  आते आते अली बंधू की  पार्टी कांग्रेस से अलग हो गयी और इसके बाद हिन्दू विरोधी साम्प्रदायिक दंगों में बहुत वृद्धी हो गयी . केरल मैं १९२१ के  मोप्लाह ह्त्या काण्ड मैं 2500  हिन्दुओं की ह्त्या कर दी गयी . इसके बाद अकेले उत्तर प्रदेश  में  मैं १९२३  से १९२७  के बीच ९१ साम्प्रदायिक  दंगे हुए . मुस्लिम लीग  ने द्वितीय  विश्व युद्ध मैं खुल कर अंग्रेजों का साथ दिया जबकि कांग्रेस ने इसका विरोध किया .  इसी तरह लीग ने  गाँधी जी के भारत छोडो आन्दोलन का समर्थन नहीं किया इस लिए हिन्दू महासभा व् संघ ने भी इसका समर्थन नहीं किया . कांग्रेस व् गांधीजी  बिना संघ के आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए  मैं पूर्णतः  सक्षम थे .  परन्तु हिन्दुओं की रक्षा के लिए    मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगों   मैं  अंग्रेज़ी सरकार  व् पुलिस  को निष्पक्ष रखना आवश्यक था . इसलिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी मुस्लिम लीग की तरह ही  अँगरेज़ विरोधी रूख नहीं लिया जिससे अँगरेज़  सरकार गांधी जी के बावजूद घोर हिन्दू विरोधी नहीं बनी और हिन्दू मुस्लिम दंगों मैं एक निष्पक्ष प्रशासक की  की तरह दोषियों को सज़ा देती रही . मोपला विद्रोह में अंततः ५०००० लोगों को काला पानी की सज़ा हुयी.

संघ की यह कांग्रेस  से राजनीतिक दूरी उसके हिन्दू व  हिन्दू  संस्कृति की  रक्षा के लिए आवश्यक थी  .

आज भी सरकार की राजनितिक मजबूरियां वही हैं .कश्मीर की मुस्लिम सरकार  ने हिन्दु पंडितों  की रक्षा नहीं की और वह कश्मीर से निष्काषित हो गए . २०१४  मैं उत्तर प्रदेश के कैराना से हिन्दुओं को घर बेचने को मजबूर किया गया  पर सरकार चुप रही . २०१३  मैं मेरठ मैं जाटों  पर ए के ४७ से गोलियां बरसाने वालों को कथित सरकारी हस्तक्षेप  के कारण  कुछ  नहीं हुआ  और असाम मैं बोडो लोगों पर भी इसी तरह दबाब डाला गया . बंगाल मैं इस तरह की अनेक घटनाएँ हुयी हैं . यह पुरानी  परम्परा  है .इसी तरह १९४६ में बंगाल के तत्कालीन मु ख्य मंत्री   सुहराब वर्दी   ने जिन्ना  की डायरेक्ट एक्शन डे को परोक्ष समर्थन दिया और कलकत्ता  की हत्यायों को पूरी क्षमता  से नहीं रोका . यही कहानी  नोखाली में दोहराई गयी जहां हिन्दुओं की व्यापक हत्याएं हुईं . शिव सेना के उदय से पहले हिन्दू सदा ही साम्प्रदायिक दंगों मैं हानि उठाते रहे हैं .

संघ के सामने प्रश्न था  की हिन्दू इतना कमजोर क्यों हो गया की वह हर दंगों मैं मरता रहा ?  भारत सदा से हिन्दू राष्ट्र था और हिन्दू  राजा से धर्म के लिए हिन्दू प्रताड़ित नहीं हो सकता था . इसलिए हिन्दू समाज का  आधार , रचना व विकास शांति व् प्रगति के लिए हुयी थी . न्याय  व शांति प्रगति की मूल आवश्यकताएं हैं .

परन्तु लम्बी शांति व आर्थिक प्रगति ने  क्षत्रियों को  छोड़ कर हिन्दुओं को अंतर्मुखी व् अति शांति प्रिय बना दिया . पर इससे उनको कोई नुक्सान नहीं हुआ क्योंकि राजा सबकी रक्षा करता था . इस परिस्थिति में भयंकर बदलाव तब आया जब राजा हिन्दू नहीं रहा ! अब पहली बार हिन्दू अपनी रक्षा करने के सक्षम नहीं रहे . इसके विपरीत मुस्लिम समाज की रचना युद्ध के लिए अधिक उपयुक्त थी . उनकी लड़ाई के लिए सदा तत्परता  , काफिरों के विरुद्ध एकता , जुम्मे को मस्जिद मैं इकट्ठा होना , उम्मा इत्यादि संस्कार एक लड़ाकू समाज के लिए बहुत उपयोगी  थे .

इसलिए हिन्दुओं को  अपनी संस्कृति की रक्षार्थ  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आवश्यकता पडी . और इसी बृहद उद्देश्य के लिए हेदेवर जी ने संघ को  राजनीती से सदा दूर रखा . दुसरे स्वार्थ व् राजनीती हर संस्था के आदर्शों का हनन करती है . एक आदर्शों को समर्पित संगठन का सत्ता  के लालच से दूर रहना आवश्यक है . प्रश्न अब यह उठता है कि क्यों भागवत  जी के कई व्यक्तव्य वर्तमान राजनीती  की आवश्यकताओं से   प्रेरित हैं . संघ सदा से हिन्दू समाज को जातिवाद से मुक्त करना के उद्देश्य से काम करता था . पर भागवत जी को वर्तमान  सरकार में जाती आधारित रिजर्वेशन को समर्थन देना पडा . स्वय मोदी जी ने गुजरात मैं  कांग्रेस द्वारा धर्म के आधार  पर आरक्षण व् सुविधाओं के दिए जाने का विरोध किया था . पर अब मुस्लिम वोटों के लिए भगवत जी भी एक के बाद एक व्यक्तव्य परोक्ष मुस्लिम  समर्थन मैं दे रहे हैं . हेग्देवर जी ने संघ को मीडिया से दूर रख कर चुपचाप काम किया . अब भागवत जी अयोध्या के राम मंदिर के शिलान्यास पर टीवी पर छाये रहे . यद्यपि उनकी उपस्थिति  संघ के सदस्यों  के लिए बहुत प्रेरणाप्रद थी  क्योंकि राम  मंदिर  संघ का घोषित कार्य क्रम है और संघ ने इसके लिए बहुत बलिदान भी दिया है परन्तु यह मीडिया की चमक कुछ छोटे लाभ के बाद संघ के बृहद दूरगामी उद्देश्यों की प्राप्ती मैं बाधक बन सकती है . कभी पाकिस्तान यात्रा के बाद जिन्नाह के सार्वजानिक प्रशंसा से रुष्ट   लोकप्रिय अडवानी जी को भी संघ ने सबक सिखा दिया था . इसकी भविष्य मैं दुबारा भी  आवश्यकता आ सकती है . सत्ता का सामीप्य आदर्शों का हनन कर देता है . किसी भी आदर्शवादी संगठन के लिए राजनीती आत्मघाती होती है और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इसका अपवाद नहीं हो सकता .

इसलिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को  एक आत्म मंथन करना चाहिए की वर्तमान स्थिति चिर स्थायी नहीं है . संघ को मूल रूप से हिन्दू आदर्शवादी  संगठन बनाये रखना अति आवश्यक है . व्यापक राष्ट्र  हित मैं संघ चालक को राजनितिक व्यक्तव्यों व् मीडिया सी दूरी बनाए रखने की स्वस्थ परम्पराओं को ही निभाना चाहिए . देश मैं योजना बद्ध  बढ़ता हुआ धर्म  परिवर्तन  व लालच वश   लुप्त होते आदर्शों और पश्चिमी  प्रभाव से घटते हिन्दू स्वाभिमान   का  पुनर्स्थापन इस समय की बहुत बड़ी आवश्यकतायें  है . संघ को  इस दिशा मैं जन सहयोग से व्यापक कार्य करने पर ध्यान देना चाहिए .

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One Response to “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का डी एन ए प्रेम : राजनीती से सामीप्य आदर्श समाप्ति की प्रथम सोपान है”

  1. Ramakant Tiwari
    July 20, 2021 at 8:20 pm #

    I had just a birds eye-view.
    Observations are not true at all. Very few people can understand strategies of RSS.
    RSS are absolutely on the right track.

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