2:05 pm - Tuesday July 25, 2017

निंदक नीयरे रखिये आँगन कुटीर छवाय – कबीर Economist : India’s Prime Minister Not As Much A Reformer As He Seems : गहन चिंतन आवश्यक है

निंदक नीयरे रखिये आँगन कुटीर छवाय  – कबीर  Economist : India’s Prime Minister Not As Much A Reformer As He Seems : गहन चिंतन आवश्यक है

 RKURajiv Upadhyaymodi puzzle

इकोनॉमिस्ट समेत सारे अंग्रेजी मीडिया के देशी व् विदेशी  अख़बार व् चेनेल भारत के मित्र नहीं हैं . इनमें से अधिकाँश भारत विरोधी हैं और सब विदेशी एजेंडा  पर काम करते हैं . २००२ के गुजरात काण्ड को जिस देशद्रोही तरीके से २०१३ के चुनाव तक प्रस्तुत करते रहे थे उससे किसी को इनका भारत का मित्र होने का संदेह  भी नहीं करना चाहिए . ये सब भारत की संस्कृति को बदल कर पश्चिमी संस्कृति लादना चाहते हैं और हिन्दू धर्म के कट्टर विरोधी हैं

.पर इस बार विदेशी पत्रिका Economist ने जो प्रधानमत्री  मोदी के बारे मैं लिखा है वह उनकी आर्थिक टीम की नाकामी उजागर करने के लिए पढ़ना चाहिए क्योंकि इस मैं लिखी अधिकाँश बातें सच हैं . इकोनॉमिस्ट जैसी प्रसिद्द पत्रिका की बात वैसे भी विदेशों मैं  मान ली जायेगी विशेषतः इस बार जब की उसकी किसी बात का खंडन करना संभव नहीं है . इसलिए उसकी बातों  पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है .

इसमें कोई संदेह नहीं है की मोदी सरकार के आर्थिक विभाग के अधिकारियों ने तीन साल मैं कोई नया ऐसा  विचार नहीं दिया  दिया  जिससे देश की आर्थिक प्रगति  को बढाया जा सके बल्कि उसे धक्का पहुंचाने वाले अनेकों कदम उठाये हैं . दूर गामी भले के नाम पर अधकचरे विचार लादे जा रहे हैं जब की उससे अच्छे कई तरीके उपलब्ध थे जिनसे उद्योगों को नुक्सान भी नहीं पहुंचता . इंस्पेक्टर व् बाबूराज चरमसीमा पर पहुंचा दिया.उदाहरण के लिए देश के कंस्ट्रक्शन उद्योग की नोट बंदी ने जो हालत खराब की उसे बचाया जा सकता था . चीन से दस लाख टन स्टील आयात करने के बजाय देसी उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए था. भारतीय स्वास्थ्य  सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहन दिया जा सकता था.इसका दुष्परिणाम  भी सामने आने लगा है. इमानदारी की अजीबो गरीब परिभाषा से बाबु कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं है .नए विचारों मैं फ़ैल होने का खतरा तो होगा ही .देश की लिए बिना गलती के जेल जाना तो बाबु जात का कर्तव्य नहीं है  .यदि देश की प्रगति करनी है तो बड़े बाबुओं  को पहले की तरह सीबीआई , विजिलेंस व् ऑडिट के डर से मुक्त करना होगा . उसकी गलती की सज़ा तब दें जब उसने उनसे व्यक्तिगत  लाभ कमाया हो .जब तक बाबू डर के काम करेगा  तब तक  यदि कोई नया समाधान अच्छा भी हो तो उसे मानेगा ही नहीं क्योंकी हर नयी चीज़ मैं खतरा होता है.

गिरते हैं शाह सवार ही मैदाने जुंग मैं , वह तिफ्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले

आंकड़ों की हेरा फेरी को हटा कर यदि नापें तो पिछले तीन साल की आर्थिक प्रगति वाजपेयी व् यूपीए – १ के समकक्ष नहीं है . झूटे आंकड़ों  से अपनी असफलता छुपाई जा रही है .

यह सच है कि तथाकथित आर्थिक सुधार भारत  के  स्वावलंबन को कम करने का तरीका नहीं बनने  चाहिए जो की अमरीका समेत सभी पश्चिमी राष्ट्र चाहते हैं . परन्तु स्वदेशी के विचारों मैं भी तो देश को आगे ले जाने की  मौलिक क्षमता होनी चाहिए . देश मैं प्रखर मौलिक विचारकों का अकाल सा दीखता है . विद्वान् अहंकारी होता है और चमचा संस्कृति मैं नहीं पनप सकता. विद्वत्ता की पहचान व् बड़ाई करना अहंकारी बाबुओं के बस की बात नहीं है .स्वदेशी जागरण मंच समेत सारे देशी विचारक कुछ नया तो नहीं बता पाए बल्कि अचानक गरीब की बातें करने लगे  . सरकार कंग्रेस काल के विचारों को कार्यान्वन कर देश की कुछ प्रगति कर रही है . पर यह भी जल्दी समाप्त हो जायेंगे . इस सरकार का कोई विचारक भी उच्च स्तरीय समाधान नहीं ला पाया है .देश की वैचारिक प्रतिभा को खोजना होगा .

इसलिए आर्थिक विभागों की निकम्मेपन से प्रधान मंत्रि की इस विदेश यात्रा मैं पहले वाली गरम जोशी नहीं है . यही बात इकोनॉमिस्ट ने अपने लेख मैं कही है .

इकोनॉमिस्ट का विचारोत्तेजक  लेख निम्न लिंक पर पढ़ें

http://www.economist.com/news/leaders/21723830-he-more-nationalist-firebrand-indias-prime-minister-not-much-reformer

Filed in: Articles, Economy

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