11:34 pm - Tuesday September 26, 2017

Is India A Cry Baby , Pakistan a Bully and America a Local Dada

singh_gilaniA few days back when Nawaz Shariff declared Manmohan Singh to be like a ‘ Dehati Woman’ , hell broke loose . But a few days later America resumed the military aid to Pakistan inspite of its so called strategic rlationship with India and Man Mohan Singh risking his career for Indo – US nuclear deal. Nawaz main objection was to India using American shoulders to cry over Pakistani misdeeds on say Mumbai , LOC etc. An indirect point was why India does not solve these issues bilaterally . Iwould add why we do not behave in a ‘ tit fot tat’ style .or in Sholey’s ‘ tum hamare ek maroge to ham tumhare teen marenge ‘.

It is an old problem . In 1947 Pakistan attacked and took 40% of Kashmir , we like a cry baby went to UNO. Pakistan attacked in Kutch we were busy taking photographs to prove that American Patton tanks were used in attack. Same happened in Kargil. We want international community to restrain Pakistan from Mumbai – 2. Pakistan beheads our soldiers we cry .dehati woman cartoon

A hindi article below examines this relationship in a lighter way . Click on link below to read full article by Lalit Kumar , thankfully taken from Bharat Kosh .

 

http://dashamlav.com/1624

 

 

भारत और पाकिस्तान दो हमउम्र बच्चें है। पाकिस्तान जहाँ एक ओर दुबला-पतला मरियल-सा बच्चा है वहीं भारत एक तंदरुस्त दिखने वाले गोल-मटोल बच्चे की छवि रखता है। हालांकि भारत ऊपर से तंदरुस्त दिखता ज़रूर है लेकिन भीतर-ही-भीतर उसमें हज़ार कमज़ोरियाँ पल रही हैं। पाकिस्तान को जहाँ से जो मिलता है, वो खा-पीकर मस्त रहता है और दिनभर दूसरों से लड़ाई झगड़ा करना उसका एकमात्र काम है। इसके उलट भारत एक रोंदू बच्चा है। हालांकि उसमें ताकत है, वो होशियार भी है –लेकिन उसमें साहस और निर्णय लेने की कमी साफ़ झलकती है। भारत अपने शरीर की अंदरूनी परिस्थितियों के कारण बहुत डरपोक-सा है और इसीलिए उसकी छवि रोंदू-भोंदू की बनकर रह गई है।

जिस कॉलोनी में ये दोनों बच्चे रहते हैं वहाँ अमरीका नाम के एक दादाजी भी रहते हैं। अब शैतानियाँ करना तो पाकिस्तान का शगुल है और इसके चलते वह अक्सर भारत को तंग करता ही रहता है। साथ ही सज़ा से बचने के लिए पाकिस्तान दादाजी को हमेशा खुश रखने की कोशिशों में जुटा रहता है। पाकिस्तान अक्सर एक दबंग बच्चे की तरह भारत को पत्थर मारता है लेकिन उसे पलट कर जवाब देने की बजाए रोंदू भारत पूरी कॉलोनी से शिकायत करने निकल पड़ता है। कॉलोनी में रहने वाले हर एक व्यक्ति के पास जाकर रोंदू भारत बताता है कि पाकिस्तान ने उसे पत्थर मारा।

दादा अमरीका अक्सर कॉलोनी के लोगों की लड़ाईयों में पैर फ़ंसाए रहते हैं। लोग कहते रहते हैं कि दादाजी हमें आपकी ज़रूरत नहीं है, आप आराम से अपने घर पर बैठिए। लेकिन दादा अमरीका के पास इतनी धन-दौलत-आराम-सुख और चैन है कि वे चैन से नहीं बैठ पाते। उन्हें इस बात की भी फ़िक्र लगी रहती है कि वे कॉलोनी के सर्वकालीन दादाजी बने रहें –सो वे हर किसी के वाद-विवाद-लड़ाई-झगड़े में बिना बुलाए “जज” बनकर पहुँच जाते हैं।

दादाजी को सबके झगड़े “सुलटाते” देख रोंदू भारत को भी लगने लगता है कि दादाजी उसे पाकिस्तान की शरारतों से बचा लेंगे। सो, भारत उनके पास जाकर रोते हुए शिकायत करता है, “दादाजी, पाकिस्तान ने मुझे पत्थर मारा। यहाँ पीछे, बड़ी जोर से लगा… दर्द हो रहा है”

कोई खुद ही अपना झगड़ा लेकर उनके द्वारे आ गया है –यह देखकर दादा अमरीका की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वे पाकिस्तान को बुलाकर उसे हल्की-सी डांट लगाते हुए समझाते हैं कि उसे भारत को तंग करने की बजाए अपनी सेहत बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए।

“शक्ल देखी है अपनी? ऐसा लग रहा है जैसे बरसों से नहाए नहीं हो। तुमने भारत को पत्थर क्यों मारा?”, दादा अमरीका बनावटी गुस्से से पूछते हैं।

“मैंने कहाँ पत्थर मारा? दादाजी, ये भारत तो जब देखो मुझ पर झूठे इल्ज़ाम लगाता रहता है। अगर मैंने पत्थर मारा है तो इससे कहो कि सुबूत लाए”, पाकिस्तान रोंदू भारत का मज़ाक उड़ाते हुए अमरीका को रटा-रटाया जवाब देता है।

यह बात कॉलोनी में किसी से छुपी नहीं है कि पाकिस्तान दादा अमरीका का लाड़ला बच्चा है। सो, आश्चर्य नहीं कि दादाजी को पाकिस्तान की बात तुरंत पसंद आ जाती है। वे अपना गला साफ़ करते हुए कहते हैं, “देखो भारत, तुम तो समझदार बच्चे हो। अगर पाकिस्तान ने पत्थर मारा है तो इसका कोई ना कोई सुबूत ज़रूर होगा। जाओ सुबूत ढूंढ लाओ, उसके बाद हम पाकिस्तान की खूब पिटाई करेंगे”

“पाकिस्तान की पिटाई होगी”, यह सोच रोंदू भारत के चेहरे पर भोली-सी मुस्कान आ जाती है। वह अपने गीले गाल लिए सुबूत ढूंढने चला निकल पड़ता है और दादा अमरीका अपने प्रिय पाकिस्तान के साथ दादा-पोते के हंसी-मज़ाक में व्यस्त हो जाते हैं। कभी दादाजी पाकिस्तान के लिए घोड़ा बनते हैं कभी उसे अपने कंधों बैठाकर घुमाते हैं और कभी उसके साथ चोर-सिपाही का खेल खेलते हैं।

दूसरी ओर रोंदू भारत अपनी बहती नाक को कमीज़ की आस्तीन से पोंछते हुए सब तरफ़ से सुबूत जुटाने में व्यस्त है। आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाती है और वह बहुत से सुबूत लेकर दादाजी के पास जा पहुँचता है। भारत सुबूत दादाजी के हाथ में थमा देता है। इस पर दादाजी बड़े प्यार से पाकिस्तान को अपने पास बुलाते हैं और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछते हैं, “क्यों बेटा पाकिस्तान, क्या तुम्हें ये सुबूत पसंद आए?”

सुबूतों को ज़मीन पर पटक कर पाकिस्तान भारत से कहता है, “अबे रोंदू, ये भी कोई सुबूत हैं? जाओ दूसरे और बड़े वाले सुबूत लाओ”

“बेटा भारत, तुम तो पाकिस्तान को जानते ही हो। थोड़ा गरम दिमाग का बच्चा है लेकिन तुम तो इस कॉलोनी के सबसे सुशील, समझदार और होशियार बच्चे हो… जाओ, ऐसे सुबूत लाओ जो पाकिस्तान को अच्छे लगें”, भारत को पुचकारते हुए दादा अमरीका कहते हैं।

“जी अच्छा”, रोंदू भारत अपनी गिरती हुई निक्कर को संभालते हुए, आज्ञाकारी बच्चे की तरह फिर से सुबूत ढूंढने निकल पड़ता है।

रोंदू भारत के जाते ही दादा अमरीका अपने सिल्क के कुर्ते की जेब से चॉकलेट निकाल कर पाकिस्तान को देते हैं और उसे अपनी गोदी में बिठा लेते हैं। दादा की गोदी में बैठ चॉकलेट खाते पाकिस्तान की आंखों में फिर से शरारत की चमक आती है और वो पास पड़ा एक पत्थर उठाकर सुबूत ढूंढने जा रहे रोंदू भारत की ओर उछाल देता है…

please wait…
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